काव्य भाषा : झुर्रियों का रहस्य – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

झुर्रियों का रहस्य

इंसानों में भी होते हैं
कुछ बरगदनुमा व्यक्तित्व
जो जितना दिखाई देते हैं सतह पर
उससे कहीं अधिक रहते हैं भीतर…
पर नज़र नही आती
उनकी गहराई….।
केवल उन्हें ही दिखाई देती है
उनकी जड़ें
जो बूझना चाहते हैं
वास्तव में
बुजुर्गों की *झुर्रियों का रहस्य*।
जो महसूसना चाहते हैं
उनके सानिध्य की खुशबू
जो हासिल करना चाहते हैं
उनसे उनके अनुभवों की शीतलता…।

अपनी मूल जड़ों से जुड़े हुए
बहुमुखी प्रतिभा के धनी
ऐसे वयोवर्द्ध
बूढ़े लेकिन परिपक्व दरख़्त
अपनी सम्पूर्णता तक
पूर्ण समर्पण भाव से
बांटते रहते हैं
अपनी छाया/प्रतिछाया
किसी पर भी
बिना कुछ हक जताए.. ।

यकीनन
हमारे आस-पास
हमारे निकट ही
विस्थापित रहते हैं
ऐसे पेड़
ऐसे बुज़ुर्ग
जिन्हें हम
दकियानूसी करार देते हुए
नज़र अंदाज़ कर
अपने ही जुनून में बढ़ते चले जाते हैं
और मुश्किल पलों में
दुखों का ताप से घबरा कर
इनकी शरण में आते हैं
इनसे लिपटते हैं
दुआओं की भीख मांगते हैं
और नकारे हुए इनके अस्तिव को
पुनः स्वीकार करते हैं…
इनकी छत्रछाया का
मन से सत्कार करते हैं।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

3 COMMENTS

  1. Life ka Sach yahi hai oogte sooraj ko salaam kiya jata hai ek din sabhi ne bujurg ki catogary mein aana hai tab ghar ki bujurgo ke sath sneh ka bartav unki ahmiyat ka bodh hona chahiye,

  2. बहुत शानदार रचना l
    वास्तव में संसार कितना ही आधुनिक क्यों ना हो जाए ;बुजुर्गों की अहमियत कभी कम नहीं हो सकती है ,आपने इसी मधुर भावना को बहुत ही बेहतरीन तरीके से कलम बंद किया है l

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