बुन्देलखण्ड के महर्षि दुर्वासा शैवदर्शन के प्रथम प्रवर्तक -सरोज गुप्ता

कश्मीर शैव संस्थान एवं ईश्वर आश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कश्मीर शैवदर्शन पर केन्द्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डा सरोज गुप्ता का वक्तव्य ।

बुन्देलखण्ड के महर्षि दुर्वासा शैवदर्शन के प्रथम प्रवर्तक -सरोज गुप्ता

कश्मीर शैव संस्थान एवं ईश्वर आश्रम ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आश्रम सत्संग हाल में आयोजित कश्मीर शैवदर्शन पर केन्द्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी में आचार्य पं दुर्गाचरण शुक्ल जी की शिष्या डा सरोज गुप्ता ने मुख्य वक्तव्य देते हुए कहा कि बुन्देलखण्ड के ऋषि दुर्वासा जी हम सबके पूर्वज व प्रथम गुरु हैं, जो मंदाकिनी के तट पर चित्रकूट में शिवसाधक थे। उनको शिव श्रीकण्ठनाथ ने आज्ञा दी कि तुम अपने योगबल से शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करो। बुन्देलखण्ड के ऐसे महर्षि अत्रि अनुसुइया के पुत्र ऋषि दुर्वासा ने अपने तपोबल से तीन मानसिक पुत्रों को उत्पन्न किया -त्र्यंबकनाथ, आमर्दकनाथ और श्रीनाथ, जिन्होंने कश्मीर में अद्वैत,द्वैत और द्वैताद्वैत शिवशास्त्रों का शुभारंभ किया। कश्मीर शैव दर्शन साधना वैदिक काल से लेकर आज तक सम्पूर्ण विश्व में हमें सर्वत्र दिखाई देती है। भारत की सुदीर्घ ज्ञान परंपरा में कश्मीर पराद्वैतशैव दर्शन, समस्त दर्शनों के नंदनवन का कल्पवृक्ष है। दिव्य शिवभक्तों की साधना का दिव्य फल है ।आचार्य शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का प्रचार प्रसार कर कश्मीर में शारदा पीठ की स्थापना की जिससे इस क्षेत्र को शारदादेश भी कहा जाता है।ईसा की पहली शती से लेकर दशमी शताब्दी तक भारतीय मेधा ज्ञान विज्ञान कला के क्षेत्र में चरमोत्कर्ष पर रही। शंकराचार्य जी ने अद्वैत वेदांत को जहां छोड़ा, कश्मीर शैवाचार्यों ने उसे और आगे बढ़ाया।कश्मीर शैव दर्शन मानवता और मानव जाति की शांति के लिए प्रेरणास्पद है। शैवाद्वैत दर्शन के प्रतिष्ठापक त्र्यंबक आचार्य यहीं पर रहे।इनकी शिष्य परम्परा में दसवें आचार्य सोमानन्द हुए।सोमानन्द के शिष्य उत्पलदेव ,उत्पलदेव के शिष्य लक्ष्मण गुप्त और लक्ष्मण गुप्त के शिष्य समस्त शास्त्र परम्परा में पारंगत सूर्य के समान देदीप्यमान महामहेश्वर अभिनव गुप्त हुए। इसी प्रकार स्पंदशाखा के आद्य प्रवर्तक वसुगुप्त हुए जिन्होंने महादेव पर्वत की तलाई में तपस्या की तत्पश्चात् भगवान शंकर जी द्वारा स्वप्न में दिए आदेश से उन्हें शिवसूत्र प्राप्त हुए। संगमादित्य, वसुगुप्त,आचार्य क्षेमराज, ललितादित्य, कल्लटाचार्य,भट्टकल्लट आदि आचार्यों की सुदीर्घ परम्परा है। गुरुदेव लक्ष्मण जू महाराज ने इन सभी शैवाचार्यों के शास्त्र ज्ञान की श्रीमद्भगवत गीता की अद्भुत व्याख्या की। विदेशों में कश्मीर शैव दर्शन के विद्वानों की धूम मची है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ अनुशील मुंशी एवं अभिनव ने किया।गुरुवन्दना से शुभारंभ संगोष्ठी में बीजवक्तव्य वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के डीन प्रोफेसर कमलेश झा ने देते हुए बताया कि कश्मीर शैव दर्शन एक मात्र ऐसा दर्शन है जो वैदिक परम्परा का पोषण करता हुआ अपना स्वतंत्र आगमिक स्वरुप रखता है। आपने आचार्य अभिनव गुप्त के परमार्थसार पर विशद विवेचन किया।मुख्य अतिथि प्रोफेसर रमाकांत अंगिरस , चंडीगढ़ ने मातृका एवं मालिनी की विशद व्याख्या करते हुए कश्मीर शैव दर्शन को संपूर्ण जगत एक तत्व बताया। यह तत्व परमेश्वर का स्वभाव रूप परिछिन्न संवित् तत्व है। यही संबित तत्व परमेश्वर के स्वतंत्र स्वभाव से ,अपनी महिमा द्वारा अपनी इच्छा से ,अपनी विलास लीला से, द्वैत अद्वैत रूप से, शुद्ध अशुद्ध रूप से, बंध मोक्ष रूप से, वैसे ही अपने को दिखाता है जैसे एक नट अपने विविध रूपों को नाना प्रकार के करतब करते हुए दिखाता है । कश्मीर शैव दर्शन में पराद्वैत रूप परतत्व चिदैकघन है, यह चित् अपरिमित है, स्वतंत्र है,सर्वथा शुद्ध संवित् है। स्वयं अपने प्रकाश से प्रकाशमान शुद्ध चित् प्रकाश रूप है ।यह चित् प्रकाश अपने स्वभाव से विमर्शात्मक है। कश्मीर शैविज्म के प्रखर प्रवक्ता श्री प्राणनाथ कौल,श्री जे के रैना, प्रोफेसर जफर,शिखा पुरोहित,मि. हारुन ,श्री अनिल बख्शी ,श्री विजय कौल श्रीमती विजयलक्ष्मी मुंशी,श्री देवेन्द्र मुंशी जी ,श्री कमल जी डॉ हरिमोहन गुप्ता सहित बड़ी संख्या में शैव उपासक उपस्थित रहे। यूएसए से मि. जार्ज बार्सलर ने लक्ष्मण जू एकेडमी से प्रसारण किया।पैनल डिस्कशन ,परिप्रश्न समाधान के साथ गुरुदेव लक्ष्मण जू महाराज के 115वे जन्मदिन पर भव्य पूजा का भी आयोजन किया गया, जिसमें शैव परम्परा के सम्पूर्ण शिव भक्तों ने सहभागिता की । कश्मीर शैविज्म पर केन्द्रित कार्यक्रम का फेसबुक लाइव प्रसारण भी किया गया।इस अवसर पर समस्त शैव विशेषज्ञों द्वारा मालिनी पत्रिका का विमोचन किया गया।

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