काव्य भाषा : गर्मी का मौसम – राजीव कुमार झा,इंद्रपुर

गर्मी का मौसम

राजीव कुमार झा

बाजार में
कितनी चहल पहल
फिर छा गयी
शादी विवाह के दिन
लगन का मौसम
शुरू हो गया
समय पर बारिश
शुरू हो जाएगी
गर्मी का मौसम
कैसे बिना बताए
बीतता जा रहा
जून का महीना
आना बाकी है
कभी कभार
बारिश भी हो रही
आकाश अब
सूना नहीं है
थोड़े से बादल
कुछ दिन पहले
आकाश में आये
किसी को बिना
बताए
मानो कोई पुराना
परिचित आदमी
घर पर आया हो
घर के बाहर
कहीं रह रहा हो
अब जिंदगी
उमस से भरी
हवा कभी
बाग बगीचों में
पेड़ की ओट में
जाकर खड़ी
रात में ठंडी हवा
बहती
दोपहर में
तालाब के किनारे
यह चुप बैठी
रहती
हरे भरे पेड़ की
छाया
दिनभर धूप में
भटककर
शाम में मानो
कोई घर
चला आया
रात में
बाजार के
बंद होने से पहले
गलियों में
रोशनी का नजारा
खत्म होता हवा का
सैर सपाटा
कल का सवेरा
सूरज का निकलना
पहाड़ पर धूप का
चमकना
हवा का दिनभर
बहना
सूने खेत खलिहानों से
निकलना
बंजर बनती जा रही
धरती अकेली
धूप के बाहर
सिर्फ रात में
जब सांस भरती
यह आनंद
अब सबको
खूब भाता
सुबह का उजाला
सबको नदी के
किनारे
बुलाता
सांझ का सुंदर
नजारा
चांदनी बाग बगीचों के
पास आकर
रात में चुप हो गयी
उसी पहर
अब नींद आती
कोई हवा मन में
समाती
अभिसार की वेला
जंगल में किस
मौसम का लगा मेला
नदी का तट
भीग जाता
खूब बारिश
कुछ दिनों के बाद
अब होगी
तुम तभी सोकर उठोगी
बाहर धूप फैली है
रात की चादर
सुबह में
कहां आज मैली है
आकाश की रोशनी है
सुबह आयी
खूब हंसती सारी दिशाएं
अरी प्रिया !
बाजार में अब घूमकर आएं

इंद्रपुर

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