विविध : जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन – डाॅ.(सुश्री) शरद सिंह

जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन

    – डाॅ.(सुश्री) शरद सिंह

    शहर में मनुष्यों की आबादी कितनी है, यह जनसंख्या गणना से हमेशा पता चलता रहता है। लेकिन शहर में वृक्षों की संख्या कितनी है? इस बारे में न कोई पूछता है और न कोई जानना चाहता है। सड़कें चैड़ी करने के लिए वृक्ष कटते हैं, रिहायशी और व्यावसायिक भवन बनाने के लिए वृक्ष काटे जाते हैं। बदले में कितने वृक्ष शहर के अन्दर लगाए जाते हैं? आंकड़ा पता नहीं। जबकि बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन और बढ़ते तापमान की हानि से कोई बचा सकता है तो सिर्फ़ वृक्ष। इसीलिए सरकार ने ‘शहरी वन’ की योजना बनाई। किन्तु कहां हैं वे शहरी वन?

    ‘शहरी वन’ की आवश्यकता पर चर्चा करने से पहले ज़रा याद करिए अक्टूबर 2019 की वह घटना जब उपनगरीय मुंबई की आरे मिल्क कॉलोनी, जिसे शहर के ‘ग्रीन लंग’ के रूप में जाना जाता रहा है, शहरी विकास का शिकार हुई। दरअसल मुंबई मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने ट्रेन डिपो के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए इस क्षेत्र में 3,000 पेड़ों को काट दिया। एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, यह जगह तितलियों की 86 प्रजातियों, मकड़ियों की 90 प्रजातियों, सरीसृपों की 46 प्रजातियों, जंगली फूलों की 34 प्रजातियों और नौ तेंदुओं का घर है। इसको लेकर सार्वजनिक आक्रोश सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए कहा। लेकिन तब तक मुंबई मेट्रो ने आवश्यक भूमि को खाली करने के लिए पर्याप्त पेड़ काट दिए थे। हम सभी नागरिक विकास और हरियाली में तालमेल की बात करते हैं लेकिन सच तो ये है कि आज भी हम में हरित क्षेत्रों और प्राकृतिक बुनियादी ढांचे के रूप में जंगलों के मूल्य की बहुत कम समझ है जो शहर के निवासियों को स्वच्छ हवा, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण, वन्यजीव आवास और प्राकृतिक मनोरंजन क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करता है। विडंबना यह कि वन विभाग, जिनके पास यह समझ है, उसकी हैसियत राज्यों और शहरों के टाउन प्लानिंग वाले विभागों की तुलना में कम है। यूं भी शहरों के फैलाव से वनपरिक्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है।
    आम नागरिकों को यह बात लगभग पता ही नहीं है कि भारत सरकार शहरों के विकास और बदलाव की प्रक्रिया को सतत और पर्यावरण हितैषी बनाने के लिये अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। पर्यावरणीय प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिये समाज के सभी वर्गों, संगठनों और सरकारी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों की जरूरत को महसूस कर रही है। केन्द्र सरकार का पूरा ध्यान उन योजनाओं को बढ़ावा देने पर है जो पर्यावरण हितैषी हों। जिससे शहरों को जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के अनुकूल बनाया जा सके। इसके लिये सरकार अत्याधुनिक तकनीक आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा दे रही है।
    सन् 2016 में, भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुंबई के बोरीवली में संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में एक समारोह में शहरी वन परियोजना योजना शुरू की थी। ऐसा कोई सरकारी आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है जिससे यह पता चल सके कि 2016 से 2020 के बीच 200 सिटी फॉरेस्ट वाली योजना ने कितना लक्ष्य प्राप्त किया। इसके बाद पिछले वर्ष, 5 जून 2020 को यानी विश्व पर्यावरण दिवस को एक वर्चुअल उत्सव के दौरान मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शहरी वन परियोजना की एक बार फिर शुरुआत की। इस योजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में देश भर के 200 शहरों में शहरी वन क्षेत्र विकसित करना है।
    देखा जाए तो शहरी वन योजना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने और शहरी प्रदूषण को कम करने की दिशा में बहुत ही कारगर योजना है। शहरी वन शहरों के जलवायु को सुधार सकते हैं। शहरों में तापमान को कम करने में वृक्ष सबसे अधिक मदद करते हैं। शहरों में कंक्रीट से बनी इमारतों और सड़कों से निकलने वाली गर्मी उन्हें आसपास के देहात के इलाकों की तुलना में अधिक गर्म बना देती है। वे ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के स्तर को भी कम कर देते हैं। इसके अलावा वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड को हटाकर ऑक्सीजन देते हैं। इस कार्बनडाई आॅक्साईड को सोख कर आॅक्सीजन बढ़ाने का काम करते हैं वृक्ष। ये वृक्ष शहरी वन के रूप में याहरों के जीवन की अभिन्न हिस्सा बन सकते हैं। वनपरिक्षेत्रों के घटने से जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई भी शहरी वन कर सकते हैं। दुनिया भर में बड़े शहरों में इस प्रकार के शहरी वन बहुत तेजी से विकसित किये जा रहे हैं। सियोल, सिंगापुर और बैंकॉक ने अपने शहर के निवासियों के जीवन में सुधार करते हुए प्रकृति और वन्य जीवन के लिए जगह प्रदान करने वाले ग्रीन कॉरिडोर्स बनाए हैं।
    शहरी वन विकसित करने में प्राइवेट सेक्टर की सहभागिता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके लिए पुणे में वारजे शहरी वन के मॉडल को अपनाया जा सकता है। यह महाराष्ट्र की पहली शहरी वानिकी परियोजना है जिसे टेरी द्वारा विकसित किया गया था, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है। इसको टाटा मोटर्स के साथ एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत एक कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पहल के तहत इसे विकसित किया गया था। झुग्गियों और बिल्डरों द्वारा वन विभाग की 16 हेक्टेयर बंजर जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया था जिसे जैव विविधता के सम्पन्न रमणीय स्थल में तब्दील कर दिया गया। यह 10,000 से अधिक स्वदेशी पौधों की प्रजातियों, 29 स्थानीय पक्षी प्रजातियों, 15 तितली प्रजातियों, 10 सरीसृप प्रजातियों और तीन स्तनपायी प्रजातियों की मेजबानी करता है। कई अन्य अच्छे उदाहरण हैं। शिमला में लगभग 1,000 हेक्टेयर के एक अभ्यारण्य है जो 1890 के दशक में नगर निकाय द्वारा प्रबंधित शिमला पेयजल जलग्रहण वन के रूप में शुरू हुआ था। दक्षिण-पूर्व दिल्ली में, असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य को गांव की आम भूमि से आरक्षित वन क्षेत्र में ले जाया गया और फिर इसे एक अभयारण्य के रूप में तब्दील कर दिया गया। दिल्ली के अरावली और यमुना जैव विविधता पार्क ने भी शहर में इन क्षेत्रों के प्राकृतिक आवासों और पारिस्थितिकी प्रणालियों को सफलतापूर्वक दोबारा स्थापित किया है। इसी तरह, गुड़गांव के अरावली जैव विविधता पार्क को नगर निगम, नागरिक समाज, निगमों और निवासियों के बीच एक अनूठी साझेदारी द्वारा वनों को देशी प्रजातियों के लिए एक आश्रय के रूप में तब्दील गया था। अब इसमें लगभग 200 पक्षी प्रजातियों को आकर्षित करने वाले सैकड़ों फूल, पेड़ और झाड़ियां हैं। शहरी वन परियोजना के लिए जापान की मियावाकी पद्धति को एक अच्छे मौडल के रूप में देखा जा रहा है। इसे जापानी वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा निर्देशित किया गया है। इसे स्थानीय परिस्थितियों के लिए स्वदेशी प्रजातियों के साथ अनुकूलित किया जा सकता है। मियावाकी वन एक उष्णकटिबंधीय वर्षावन की प्रतिकृति बनाते हैं। इसमें छोटे वृक्ष नीचे और ऊंची-ऊंची छतरियों वाली प्रजातियां ऊपर होती हैं। पारंपरिक वानिकी में, एक एकड़ में लगभग 1,000 पेड़ उगाए जाते हैं। हम मियावाकी के तहत इतने ही क्षेत्र में 12,000 पौधे लगाते हैं, जो 10 वर्षों में 100 साल पुराने जंगल का लाभ पैदा करता है।
    अब बात मध्यप्रदेश के सागर जैसे मझोले कद के शहरों की की जाए तो यह शहर फिलहाल औद्योगिक प्रदूषण से दूर है लेकिन आर्थिक विकास के लिए हमेशा उद्योगों से दूर नहीं रहा जा सकता है। इस शहर ने भवन निर्माण, सड़कों के चैड़ीकरण आदि में अपने अनेक वृक्षों को गंवाया है। सागर जैसे शहरों में आबादी और वाहनों की तुलना में वृक्षों की संख्या न्यूनतम है। जब से स्मार्टसिटी योजना लागू हुई है तब से कचरा प्रबंधन की ओर तत्परता से ध्यान दिया जाने लगा है। गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण पर भी जागरूकता आई है। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। हम वैश्विक स्तर प्रदूषण के जिस प्रतिशत से जूझ रहे हैं, उसमें इतना पर्याप्त नहीं है। भविष्य के विकास को ध्यान में रखते हुए भी शहरी वन योजना को एक स्मार्ट समाधान के रूप में तेजी से अमल में लाने की जरूरत है। वृक्ष एक दिन में बढ़ कर इतने तैयार नहीं हो जाते हैं कि वे प्रदूषण से जूझ सकें। कुछ मनोरंजन पार्क बना देने या सड़क डिवाईडर पर फूलों के पौधे लगा देने से वायु प्रदूषण एवं तापमान के स्तर को हम नहीं काट सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि शहरी वन के लिए क्षेत्र चिन्हित कर के वे वृक्ष लगाएं जाएं जो सघन होते हैं और वायु एवं ग्लोबल वार्मिंग की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। इस दिशा में जनजागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है जिससे नागरिक शहरी वन योजना को अज्ञानवश क्षति न पहुंचाएं। वस्तुतः शहरी वन छोटे-बड़े, मंझोले सभी तरह के शहरों के लिए जरूरी हैं। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि वृक्ष हैं तो ऑक्सीजन है और ऑक्सीजन है तो संासे हैं। शहर के इको सिस्टम को भी बनाए रखने में भी शहरी वन अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं।

    सागर (मप्र)

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