पहली मुहब्बत लिखूँ,या उसे,आखिरी लिखूँ – अशोक कुमार ओझा आनन्द,गुजरात

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पहली मुहब्बत लिखूँ,या उसे,आखिरी लिखूँ

कविता लिखूँ उसे, या उसे, कोई शायरी लिखूँ,
अस्मिता लिखूँ उसे, या उसे, कोई ख़ातिरि लिखुँ ।
सवाली सुबह लिखूँ उसे, या उसे, दुपहरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

१.
फ़साने तो हैं आसमाँ से परे, जुगनू से तराने,
न जाने कहाँ-कहाँ के सारे, मजनू हैं दीवाने ।
लैला लिखूँ उसे, या यूँ बला की टोकरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

२.
शराबी से उसके नैन हैं, अलबत्ता, होश उड़ायें,
नबाबी में बेचैन हैं, जैसे खुद का, बोझ उठाये ।
इसे ज्यादती लिखूँ, या कोई, जादूगरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

३.
चेहरे पे गिरी जुल्फें, सहज ही, आस जगाएं,
पहरे पे बैठी पलकें, बरबस ही, प्यास बढाएं ।
अभिनय लिखूँ इसे या, कोई अंताक्षरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे आखिरी लिखूँ ।

४.
कागज की सेज पर कलम की, है सुहागरात,
सनसनीखेज धड़कन, सी कोई, है ये वारदात ।
कायदा लिखूँ इसे, या कि पूरी, कचहरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

५.
मशगूल हूँ मैं उसमे, या ये कोई, मेरी भूल है,
उड़ती धूल है वो, या वो, फुलवारी का फूल है ।
दस्तखत लिखूँ इसे, या दिल पे हाजिरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखुँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

६.
पलकों की पंखुड़ी में कोई, विरहन दिखाई दे,
साँसों की सबूरी में कहीं, कोई सरगम सुनाई दे ।
उसे होठों पे थिरकती हुई, कोई बांसुरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

७.
बेगानी नहीं है वो, उसको कैसे, बेवफा लिखूँ,
नादानी इसे कहो, पर कैसैं, उससे खफा रहूँ ।
बागी लिखूँ उसे, या ये उसकी, बाजीगरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

८.
मासूम सा मचलता है वो, सबके जमीर पर,
उसका ही हुक्म चलता है, सबके वजीर पर ।
गुनाहगार, या कि सारे, गुनाहों से बरी लिखूँ ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

९.
नील गगन से भी ज्यादा कहीं, उसमे गुरुर है,
शीतल पवन से ज्यादा कहीं, उसमे सुरूर है ।
चंदा लिखूँ उसे, या उसे चंदा की , चाँदनी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

१०.
तपीस है, त्रास है, या वो कोई, नशीला सुवास है,
बारिश की आस है, या बस, नीला आकाश है ।
गंगा लिखूँ उसे, या उसे, पूरी गोदावरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

११.
सपना है वो, या यूँ ही कोई कोरी, कल्पना है वो,
धारणा है वो, या यूँ ही कोई, अवधारणा है वो ।
अप्सरा लिखूँ या आसमाँ से, उतरी परी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ ,या उसे, आखिरी लिखूँ ।

१२.
रहती है सबपे उसकी नजर, ऐसी नजर है वो,
मिलती है उसी मे हर डगर, ऐसी डगर है वो ।
उसे हमसफ़र लिखूँ, या उसे, मुसाफिरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे, आखिरी लिखूँ ।

कविता लिखूँ उसे, या उसे, कोई शायरी लिखूँ,
अस्मिता लिखूँ उसे, या उसे, ख़ातिरि लिखूँ ।
सवाली सुबह लिखूँ उसे, या उसे, दुपहरी लिखूँ,
पहली मुहब्बत लिखूँ, या उसे आखिरी लिखूँ ।

अशोक कुमार ओझा
आनन्द,गुजरात

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