लघुकथा : ज़ख्म और मरहम – डॉ० उपासना पाण्डेय प्रयागराज

ज़ख्म और मरहम

बिस्तर पर लेटी सुहाना की आँखें खुली तो उसने परिवार के सभी सदस्यों को अपने अगल-बगल पाया। सभी के चेहरों पर उसके स्वास्थ्य को लेकर चिन्ता साफ-साफ झलक रही थी। उसके सिरहाने सासू माँ बैठी बालों को सहला रही थीं।
यह सब देखकर उसकी आँखें भर आयीं। उसे अपनी सोच पर पछतावा होने लगा, पर सबके स्नेह को देखकर अपने भाग्य पर हृदय प्रसन्नता से गद्गद हो उठा। सुहाना ने इसी परिवार के लिए अपनी महत्त्वाकांक्षा को छोड़कर साधारण-सी गृहिणी बने रहना स्वीकार किया था। समय बीतने के साथ उसे लगने लगा था कि परिवार में उसका कोई महत्व नहीं रह गया है। वह कहीं हाशिए पर चली गई है। उसके प्रेम, त्याग और सेवा को समझने वाला कोई नहीं है। इस कुण्ठा में वह दिनोदिन गलती जा रही थी और अंततः एक दिन बेहोश होकर गिर गई।
आज उसके उन ज़ख्मों पर परिवार के प्रेम और अपनेपन ने ऐसा मरहम लगा दिया, जिससे उसको ताउम्र के मानसिक दर्द से निजात मिल गई।

डॉ० उपासना पाण्डेय
प्रयागराज

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