लघुकथा : दहलीज के संस्कार – श्रीमती श्यामा देवी गुप्ता दर्शना भोपाल

लघुकथा
दहलीज के संस्कार

“”अरे अनु,कुछ तो बता ?तुझे मायके आए हुए चार ,पाँच दिन हो गए,पर तेरे चेहरे की उदासी से
घर के सभी चिंतित हैं? बताना क्या बात है, कुछ……
तभी अनु थोड़ा मुस्कुरा कर बोली….
“”देख शालू तू तो जानती है ,कितनी परेशानी से भैया नेरी शादी की थी,इन छह सालों से मैं
हर दिन उस मनहूस दिन को याद करती हूं,काश मेरी ….
तभी शालू बोली ..
“”तू तो खुद के पैरों पर खड़ी है, बैंक की नौकरी और नंन्ही बेटी और छुटकू जैसा बेटा…
“”तू नही समझती शालू ,पति तपन का व्यवहार ?उन्हें मेरे हर काम में नुक्श निकालना जैसे उनकी आदत में शामिल है।
इधर मेरी नौकरी भी उन्हें अच्छी नही लगती। खुद तो बेरोजगार हैं,
जहाँ भी नौकरी करते हैं,दो तीन माह बाद छोड़कर घर बैठ जाते हैं और चाहते हैं मैं भी…..
कहते हुए आँख में आए आसूओं को पौछने लगी…
तभी शालू बोली …..
“”हद है ,तेज तर्रार,हमेशा महिलाओं पर होते अत्याचारों पर बोलनै वाली आज यह सब क्यों बर्दाश्त कर रही है. तलाक ले यार
छोड़””
तभी अनु बोली….
“” की समाज की अपनी कुछ मर्यादाए भी होती हैं।पता है माँ ने मुझे दहलीज के संस्कारों से विदा किया था,और मैं चाहती हूँ उन्हें बरकरार रखूँ…..”
“”पर कैसे?
“”शालू को चाय का कप पकडाते हुए ….
“”समय गतिमान है ,आज नही तो कल देखना मैं सब ठीक कर लूंगी
तू चिंता मत कर…..

श्रीमती श्यामा देवी गुप्ता दर्शना
भोपाल मध्यप्रदेश

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here