लघुकथा : फैसला – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

फैसला

“सुनन्दा ही बोल रही हो न….?” संध्या ने झिझकते हुए प्रश्न किया

“हाँ… हाँ संध्या, सुनन्दा ही बोल रही हूँ…कैसी हैं तू …बड़े दिनों बाद याद आई अपनी सखी की…। कई बार संपर्क करने की कोशिश की तुमसे,पर तुम्हारा फोन ही नही लगता था…”

“बस जरा…घिरी हुई थी घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों से। फोन भी खराब हो गया था। सारे नंबर डिलीट हो गए थे। कल ही ठीक करवाया है..डायरी में दर्ज नंबर दोबारा एड किये, तभी बात कर पा रही हूँ…।
खैर!! तू बता कैसी चल रही है तेरी गृहस्थी…..निभ रही है न बहू-बेटे से.. ”

“सब ठीक चल रहा है संध्या….। अच्छा हुआ तूने फोन कर लिया..। वरना आज नही तो कल मैं ही तुम्हें फोन करने का ट्राय करती आखिरी बार…”

“आखिरी बार ..मतलब..”

“वो वीजा आ गया है न हमारा…बेटा-बहू विदेश जाने की जिद पर अड़ गए थे। सोमी और बहू ने बाहर जॉब ढूंढ ली है। अक्षर अभी छोटा है….उसे संभालने के लिए मुझे भी साथ जाना पड़ेगा न… अगले हफ्ते की फ्लाइट है…”
दूसरी तरफ छाई ख़ामोशी से सुनन्दा थोड़ा विचलित सी हो गई…
” क्या हुआ संध्या तू तो चुप ही हो गई मेरे बाहर जाने का समाचार सुनकर…तुझे खुशी नही हुई न इस खबर को सुनकर ”
” अरे नही बहुत खुशी हुई मुझे तुम्हे खुश देखकर…मैं जरा देर के लिए तुम्हारी जगह खुद को रखकर सोचने लगी थी..अपना दिल हल्का करना चाह रही थी बस….जिज्ञासा सी थी मन में कि तुम रह लोगी विदेश में…अकेले…।”

” कहाँ अकेली हूँ मैं…साथ में बच्चे तो रहेंगे मेरे…। उनसे अलग हुआ जाता है भला…”
फिर थोड़ा समझाने के मूड से बोली…” देख संध्या भले ही स्त्री के पास अपने क्षितिज में उड़ान भरने के लिए खुद के पँख होते हैं, मगर वह अपने पँखों को बचपन से लेकर उम्र के अंतिम पड़ाव तक परिवार से मिले हौंसलों से ही उड़ान दे पाती है। देख न..जन्म लेने के बाद माता पिता के पँखों से बंध कर मैंने उड़ना सीखा..फिर ब्याही गई । बाद में पति मेरा हौंसला बने….उनके पँखों ने मेरे पँखों को उड़ने के काबिल बनाया…। ईश्वर की मर्जी से उन्होंने बीच राह में जब मेरा साथ छोड़ दिया, तो बेटे ने अपने पँख खोल दिये…मैंने उन्हें थाम लिया..। अब पोता बड़ा हो रहा है…बेटे के पँख शिथिल हों इससे पहले ही मैं पोते को प्रवीण कर दूंगी उड़ान भरने के लिए… । क्यों सोमी के साथ विदेश जाने का मेरा फैसला ठीक तो है न…।कहीं मैंने कोई गलत निर्णय तो नही ले लिया …? ”
संध्या सुनन्दा को कोई उत्तर देती इसके पहले ही उसे पुष्पेंद्र का स्वर सुनाई दिया..” किससे बात हो रही है माँ…तुमने कोई फैसला लिया या नही हमारे साथ विदेश जाने का..?”
संध्या ने सुनन्दा को डिस्कनेक्ट करते हुए बड़े आत्मविश्वास के साथ हाथ में रखा पासपोर्ट पुष्पेंद्र के हाथ में दे दिया….नए हौंसलों के साथ नई उड़ान भरने के लिए…..।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. हमेशा की तरह एक अच्छी , पठनीय और जज्बातों से भरी हुई लघु कथा .
    😊😊😊💐💐💐😊😊😊

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