बुन्देलखण्ड के बिखरे मोतियों को सहेजती पुस्तक -हमाओ सागर : समीक्षक-प्रोफेसर सरोज गुप्ता ,सागर

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पुस्तक -हमाओ सागर
रचयिता-श्रीमती जयंती सिंह लोधी
प्रकाशक-जिज्ञासा प्रकाशन, गाजियाबाद-२०१०१३
समीक्षक-प्रोफेसर सरोज गुप्ता

“हमाओ सागर”-पुस्तक की रचयिता श्रीमती जयंती सिंह ने घर परिवार की जिम्मेदारी, गृहस्थी के दायित्वों का निर्वहन करने के साथ बचपन से सुने हुए लोकगीतों के संकलन का अपना चिर संचित सपना पूरा किया है।लेखिका ने बुंदेली रीतिरिवाज और गायकी की बुंदेलखंडी संवेदनाओं को न सिर्फ जिया वरन् कागज पर उकेर कर हमारी शाश्वत,श्रेष्ठ व पावन परम्पराओं को आने वाली पीढ़ी को सौंपने का दायित्व भी निर्वहन किया है। पुस्तक का नामकरण “हमाओ सागर” में एक अद्भुत ठसक तथा कर्मभूमि के प्रति आत्मीयता का भाव गहराई लिए है । पुस्तक की भूमिका प्रख्यात समाजसेवी गांधीवादी विचारक श्री रघु ठाकुर जी ने लिखी है ।आपने बुंदेलखंड की परंपराओं और आचार विचार की भूरिभूरि प्रशंसा की है । बुंदेलखंड के स्वास्थ्यपरक गीतों को उद्धरित करते हुए आपने कहा कि “चैतै गुड़ बैशाखै तेल” तथा “क्वार करेला कातिक दही”जैसे गीत हमें भोजन की समझ देते हैं।श्री रघु ठाकुर जी ने इन गीतों की सम्यक् समीक्षा, सटीक व सार्थक व्याख्या के साथ बुंदेली संस्कारों को अपनाने की बात कही है। रचयिता श्रीमती जयंती सिंह लोधी ने हमाओ सागर पुस्तक को पांच खण्डों में विभाजित किया है। प्रथम खण्ड में जन्म के समय के रीति-रिवाज एवं पारम्परिक गीतों के माध्यम से जनजीवन में प्रचलित सोहर गीत जो अभी तक आधे अधूरे ही सुनने में आते थे,इन गीतों को पूरे मनोयोग से समग्र भाव से यथावत् प्रस्तुत किया है।यही नहीं बुंदेलखंड के रीति-रिवाजों की वैज्ञानिकता, प्राचीन काल से चले आ रहे परम्परागत आयुर्वेद के नुस्खे, गुड़ मेवे के लड्डू बनाने की विधि सहित बहुप्रचलित सोहर गीत “आज दिन सोने कौ महाराज” से लेकर संयुक्त परिवार के दस्टोन कार्यक्रम तथा सास बहू के सामंजस्यपूर्ण माधुर्य व्यवहार की झलक इन गीतों द्वारा प्रस्तुत की है। सास के सम्मुख अपने देखे हुए सपने को बहू गीत के माध्यम से बड़ी सिद्दत के साथ रखती है। खुशियों के वातावरण में उल्लास है, मस्ती है, जीवन जीने की ललक है। रीति रिवाजों झूले झालर ,रमतूला की तान पर थिरकती खुशियों का, सोलह संस्कारों का अप्रतिम वर्णन के साथ पालना गीत-“पार्वती के पुत्र गजानन झूल रहे” -कुंआ पूजन गीत, लोरी गीत आदि जिसमें मां बेटे को वीर का संबोधन करते हुए वीरता के भावों से पोषण करती है- “सोजा सोजा वारे वीर, वीर की बलैंया ले गए जमुना के तीर अर्थात- यमुना किनारे से विदेशी सैनिक यदि आक्रमण करें तो मेरा बेटा वीरता का परिचय देना, मैं बलैया लूंगी। बुंदेलखंड वीरों और कवियों की भूमि है। रणवाकुंरों ने यहां पर हंसकर अपने प्राण न्यौछावर किए हैं। द्वितीय खण्ड में विवाह के समय के रीति-रिवाज, गीत और उनके महत्व को ओली भराई से लेकर विदाई तक के गीत जो आज हमें कहीं नहीं सुनाई देते हैं ,जयंती जी ने बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किये हैं। वैवाहिक दस्तूर ओली भराई,लगुन,फलदान,मटयायनो, मड़वा,देवी देवताओं को निमंत्रण,मातृका पूजन,तेल,हल्दी, उबटन,राछ, हरदौल पूजा,बारात प्रस्थान,बाबा और गौरैया, द्वारचार,बारात आगमन -बेटी के घर,चढ़ाव चढ़ाना, कन्यादान,भांवर पांवपुजाई,बिदाई आदि के हरेक नेगचार के अद्भुत गीतों की रंगीन छटा को लेखिका ने बड़े मनोयोग से पुस्तक में संजोया है।
तृतीय खण्ड में तीज त्यौहारों के लोकगीत वर्णित हैं। बरसात के गीत, बसंत ऋतु के गीत,फसल कटाई के गीत,शीत के गीत, भक्ति के गीत, बच्चों के खेल गीत, नवरात्र में देवी के भजन, अनगढ़ देवी रानगिर की मातारानी की महिमा के साथ मंदिर निर्माण की किंवदंतियों का ऐतिहासिक वर्णन किया है। छतरपुर जिले की अबार माता के निर्माण में आल्हा ऊदल के योगदान का सुन्दर वर्णन ,देवी भक्तें तथा बारह महीने के तिथि त्यौहारों के साथ बुंदेलखंड के खास त्यौहार अक्ती के विशेष महत्व को लोक गीतों के साथ विशद विवेचन किया है।सावन में कजरी,बंबुलिया,बेटी गीत, चेतावनी गीत, लमटेरा की तानें, कार्तिक पूजा गीत- “आ जाऊंगी बड़े भोर,दहीरा लेके,आ जाऊंगी बड़े भोर” की मनोरम भावों से पुस्तक को संग्रहणीय बना दिया है।
चतुर्थ खण्ड में बुंदेली नृत्य और बुंदेली कलाएं जिसमें बरेदी नृत्य, बधाई नृत्य,राई नृत्य, नौरता नृत्य,सैरा नृत्य,ढिमरयाई नृत्य, किन्नर नृत्यों का विशद वर्णन किया है। बुंदेली कलाएं हमारे बुंदेलखंड की पहचान हैं। मिट्टी और गोबर की कला कृतियों का अपना महत्व है। दीपावली पर मिट्टी के दिए,डबुलिया,दीपों से सजी मालिन जिन्हें कुम्हार अपनी मेहनत से इस संस्कृति की जड़ों से पूरे बुंदेलखंड को जोड़ते हैं। संक्रांति की बुड़की,जबारे,दूर्वाष्टमी, दीपावली,गोबर्धन,गोबर की दोजें,आटे के चौक,सांतिया, सुरेहती आदि सब जयंती जी ने पुस्तक में उकेरे हैं।
पंचम खण्ड में बुंदेली जेवनार और व्यंजनों के गीत प्रस्तुत किये हैं। पकवानों में कढ़ी,महेरी,महुआ के लटा,डुबरी,कुचिया,बरा,मगौरा, लुचई ,ठड़ूला,बिजौरा, गुझिया,हलुआ,लबदो,बिरचुन,निगौना,सतुआ आदि के साथ ज्वार,बाजरा,बिर्रा की बुंदेलखंड की रोटियां भटा गकरिया के स्वाद से पुस्तक को पठनीय बना दिया है। लेखिका ने कुछ कुप्रथाओं, कुरीतियों का उल्लेख भी किया है जो समाज के लिए शुभ, उचित व कल्याणकारी नहीं है। जैसे-बालविवाह, दहेजप्रथा,मृत्युभोज, भ्रूणहत्या आदि का भरपूर विरोध किया है। बुन्देलखण्ड के सोलह संस्कारों, वृक्षों के पूजन , बच्चों के खेलों यथा -विष अमृत,छुपम छुपाई आदि को भी पुस्तक में स्थान दिया है।
पुस्तक का सारांश लिखने के पश्चात लेखिका ने अपने परिचय के साथ ग्रामीण परिदृश्य, गोबर की दोज ,गोबर्धन होली की मलियां,आटे के चौक व तिथि त्यौहारों पर बनाये जाने वाले चित्र, डिजाइनदार पापड़ आदि चित्रों को स्वयं सुसज्जित किया है। लेखिका द्वारा ग्रामीण लोकजीवन की भूली-बिसरी परम्पराओं के संकलन का प्रयास अत्यंत सराहनीय है।

डॉ सरोज गुप्ता,अध्यक्ष हिन्दी विभाग
पं दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म प्र)

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