तू सूरज है या हो आफ़ताब, तुझे प्रणाम भी और सलाम भी

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तू सूरज है या हो आफ़ताब, तुझे प्रणाम भी और सलाम भी

हमारे देश में किसी बात को सांप्रदायिक कहकर उसका विरोध करना या अपने लोगों को विरोध के रास्ते पर चलाने का जमकर चलन है. हम अच्छे हैं कहना ठीक है लेकिन हमारे अलावा कोई अच्छा नहीं है ये कहना सरासर गलत है.
जब तक समझेंगे नहीं तब तक कुछ भी मानकर पीछे चलना अंधभक्ति है या अंधी तक़्लीद है. चाँद को देखकर करवा चौथ का उपास तोडना या चाँद को देखकर ईद मनाना क्या चाँद का खुदा की तरह इबादत करना नहीं है. वैसे ही सूरज को सुबह उठकर अर्ध्य देना या रमजान में आफ़ताब के निकलने से पहले रोज़ा शुरू करना और फिर उसके ढलने पर रोज़ा खोलना क्या सूरज की पूजा या इबादत नहीं है.
खैर 12 जनवरी को युवा दिवस के अवसर पर मुस्लिम संगठनों ने अपने लोगों को सूर्य नमस्कार करने से इंकार किया है, उनका कहना है कि इस्लाम में यह करना कुबूल नहीं है. ऊपर से सरकारी आदेश भी जारी हो गया है कि सूर्य नमस्कार करने के लिए उन्हें कोई बाध्यता नहीं है.
अगर मेरी दृष्टि में यदि साक्षात भगवान् या खुदा अगर है तो वो सूरज ही है, अगर सूरज नहीं तो धरती नहीं, चाँद नहीं, खेत नहीं खलिहान नहीं इन्सान नहीं. तो जिसके कारण इस धरती पर सब कुछ होता है तो उसकी इबादत क्यों नहीं.
ये भी थोडा सा समझने कि बात ही है कि हर धर्म या मज़हब में पूजा या इबादत की विधियों या तौर तरीकों में कहीं न कहीं योग में नामित शारीरिक क्रियाएं उपयोग में ली जाती हैं.
यदि पाठक अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहें तो मुझे @bbrgandhi पर ट्वीट कर सकते है या इन्स्टाग्राम पर B B R Gandhi या फेसबुक पर भी B B R Gandhi सर्च करके दे सकते हैं. मेरा यह लेख किसी को कुछ भी अपने सिद्धांतों के विपरीत कुछ भी करने के प्रेरित करने वाला नहीं है केवल अपने दिल में अलगाव के भाव से दूर करने का साधारण सा प्रयास है.
– इंजी. भारत भूषण आर गाँधी
(पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता)

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