चिकित्सा जगत के संत थे डॉ इन्दर – इंजी. बीबीआर गाँधी

चिकित्सा जगत के संत थे डॉ इन्दर

साल का आखिरी दिन और शाम ढल चुकी थी, रात ने अपने पैर पूरी तरह पसारना शुरू कर दिया था तब खबर मिली कि डॉ आई एल बत्रा नहीं रहे. डॉ आई एल बत्रा का पूरा नाम इन्दर लाल बत्रा था वो पार्टीशन के बाद इअतारसी आकर बसे बत्रा परिवार के किशन लाल बत्रा के पुत्र और इटारसी पंजाबी समाज के संस्थापक अध्यक्ष गोविन्द लाल बत्रा के भतीजे थे. इन दोनों भाइयों का पूरा परिवार मेडिकल व्यवसाय से जुड़ा हुआ है.
बत्रा परिवार से उनकी जानकारी के बारे में बात करें तो डॉ आई एल बत्रा अपने पिता के तीसरे पुत्र थे, उनके बड़े भाइयों में रामजी लाल बत्रा पीडब्लूडी विभाग से अधीक्षण यंत्री पद से सेवा निवृत्त हुए थे, दूसरे बड़े भाई जगदीश बत्रा अपने पिता और चाचा के साथ बत्रा मेडिकल स्टोर के सञ्चालन का काम देखते थे. उनसे छते एक और भाई राजकुमार बत्रा भी मेडिकल व्यवसाय कर रहे हैं जिनका नाम इटारसी के सामाजिक एवं धार्मिक जगत में विख्यात है, एक छोटी बहन किरण इटारसी के ही वृहद् गाँधी परिवार में बहु है.
डॉ आई एल बत्रा ने ग्वालियर से अपनी पढाई पूरी करने के बाद आज के गुरुनानक और शिव कॉम्लेक्स के बीच कई वर्षों तक क्लिनिक चलाकर जन सेवा करते रहे, बाद में घर से और सूरजगंज चौराहे के निकट एक दुकान से क्लिनिक चलने लगे. साथ ही उनहोंने इटारसी के गुरुद्वारा में २२ वर्षों तक फ्री सेवाएं दीं. पिछले कुछ सालों से बढ़ती उम्र के कारण उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था. उनके बच्चों में बेटा होमियोपैथी चिकित्सक डॉ राकेश बत्रा के नाम से विख्यात है.
डॉ आई एल बत्रा को चिकित्सा जगत का संत वो हरेक आदमी कहेगा जो उन्हें थोडा बहुत भी जानता होगा, वो अपनी मीठी वाणी के साथ लोगों का इलाज करते थे और न जाने कितने लोगों के परिवारों का हिस्सा बन चुके थे. ऐसे सैकड़ों लोग रहे होंगे जिन्हें दवा कंपनियों से मिलने वाली दवाएं मुफ्त में देकर उनका इलाज किया होगा, आज कई ऐसे भी होंगे जिन्होंने उनके सामने ही वैवाहिक जीवन शुरू किया होगा और उनके बच्चों का निशुल्क इलाज भी किया होगा. वो सभी उनके इस एहसान को याद करके ऑंखें नम किये बैठे होंगें.
उनकी पुरानी क्लिनिक में कई लोग आकर घंटों बैठा करते थे उनसे बहुत सारी बातें और सलाह मशविरा किया करते थे. उनमें से भी कई लोग इस दुनिया से कूच कर गए और जो आज हैं, उन सभी के परिवार के लोगों की आँखें उन्हें याद करके नम हैं. मानव समाज में ऐसे बिरले ही पैदा होते हैं जो व्यासायिक क्षेत्र में संत की तरह जीवन जीते है और जाते जाते भी उनके दिलों में अमित छाप चुद जाते हैं.
सैकड़ों परिवारों के दिलों में एक और याद डॉ आई एल बत्रा छोड़ कर गए हैं कि जब जब साल के अंतिम दिन कि रात आएगी वो याद आएंगे और जब जब साल का पहला दिन आएगा तब तब उनकी अंतिम यात्रा याद आयेगी. ईश्वर करे कि उन सभी परिवारों पर उन्होंने सैंकड़ों कृपाएं की हैं उनके बदले में उन्हें अपनी प्रेममयी शरण में लेकर भवसागर कि आवाजाही से मुक्त करें मोक्ष प्रदान करें.

इंजी. बीबीआर गाँधी
फ्रीलान्स जर्नलिस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता

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