कैसे होगा गाली मुक्त समाज – इंजी. भारत भूषण आर गाँधी

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कैसे होगा गाली मुक्त समाज

गाली एक अभिव्यक्ति ही तो है उसके लिए इतना सोचना ही क्यों? हो सकता है आपको इस बात पर कोई आपत्ति न हो लेकिन किसी और को तो हो सकती है. चाहे जहाँ चले जाइये आजकल इसके बिना काम ही कहाँ चल रहा है. हम कैसे सभ्य की कल्पना कर सकते है जो गाली न बकता हो या गाली न सुनता हो. क्या ये बढ़ते बच्चों के बीच में या महिलाओं के बीच में या उनके लिए कही जाने वाली गालियां या शारीरिक अंगों को जोड़कर कही जाने वाली गालीनुमा अभिव्यक्तियां सभ्य समाज से दूर होंगी?
शायद ही कोई ऐसा दफ्तर या विभाग होगा जिसमें बैठे या आनेजाने वाले लोग इन गालियों का प्रचुर मात्रा में उपयोग न करते हों.
किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को जान से मारने कि धमकी दी हो और अगर शिकायतकर्ता अपनी शिकायत दर्ज कराने में इस बात का उल्लेख न करे कि धमकी देने वाले ने अमुक-अमुक गालियों को देते हुए जान से मारने की धमकी दी है तो शिकायत में दम नहीं माना जाता.
फिल्मों में सीधे-सीधे न सही सांकेतिक शब्दों और हरकतों से जरुर पता चलता है कि नायक या खलनायक कौनसी गाली देना चाहते हैं. फिल्मों का वर्गीकरण किया जाता है जिसमें यू, यूए, ए, 2ए, 3ए, आदि सर्टिफिकेट से पता चलता है कि फिल्म देखने के लिए किस उम्र तक के लिए वर्जित या अवर्जित है.
आजकल आप किसी रंगशाला में नाटक देखने चले जाइये जहाँ भले ही आप अपने बच्चों के साथ बैठे हों आधुनिक काल के नाटकों के मंचन में गालियों का उपयोग आपको देखने-सुनने को मिल ही जायेगा. इसके अलावा वेब सीरीज जिनका चलन आजकल कुछ ज्यादा ही है, उनमें तो धड़ल्ले से गालियाँ हर एक दो मिनट में सुनने को मिल जायेंगीं ख़ास तौर पर क्राइम सीरीज में तो इसकी भरमार हो चली है. वहीं स्टैंडअप कॉमेडी शोज में एंकर भोंडे तरीके से बड़े मजे से हरकतें करते हुए गालियाँ दे रहा होता है और बिना लिंगभेद के युवा दर्शक ठहाके लगा रहे होते हैं.
सोशल मीडिया में भी जमकर गाली गलौज चलती दिखाई देती है. किसी भी सार्वजानिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों के ट्वीट और फेसबुक पर रिएक्शन देने वाले अनेक लोग सभी मर्यादाओं को ताक़ पर रखकर जमकर गालियाँ बरसाते देखे जा सकते हैं.
आप चाहे जहाँ चले जाइये अधिकतर सार्वजनिक शौचालय बदतर हाल में मिलेंगे और उनकी दीवालों पर भद्दी-भद्दी गालियाँ और चित्रकारियां पढने और देखने को मिल जाएँगी. अनेक रेलगाड़ियों के शौचालयों में भी गालियाँ और चित्रकारियां खूब दिखाई देती हैं.
मैं अपनी कहूँ तो मीडिया के लिए बच्चों से जुड़े मामलों कि सही रिपोर्टिंग करने की समझाइश एक मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन मेरे पास मौजूद है जो शासन के दिशा निर्देशों का सही पालन करने एकीकृत बाल संरक्षण सेवा के उद्देश्यों से जुडी है. शासन और मीडिया स्तर पर लेखन के कार्यों में अनेक शब्दों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है.
बात बच्चों से जुड़ गई है तो इतना भी जान लीजिये कि बच्चों की शासकीय शिक्षण संस्थाएं जहाँ इन स्कूलों में जिनमें बालिकाएं भी अध्ययनरत हैं के बालक शौचालयों में बहुत कुछ ऐसा देखने को मिल जायेगा जिसको देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि गाली मुक्त समाज कभी भी मूर्त रूप ले ही नहीं सकता.

इंजी. भारत भूषण आर गाँधी
(स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता)

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