काव्य भाषा : फिर से वही मधुरिम प्रिये, संगीत आना चाहिए -नीलम द्विवेदी रायपुर

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फिर से वही मधुरिम प्रिये, संगीत आना चाहिए

जो गुनगुना चाहती, ज़हन में गीत आना चाहिए।
फिर से वही मधुरिम प्रिये, संगीत आना चाहिए।।

जो आँखों को मेरी भाए, वही चित्र आना चाहिए।
बहूत लंबी जुदायी है, तेरा इक पत्र आना चाहिए।

जो सब्र के बाँध भी टूटें, न ऐसे आजमाना चाहिए।
अब बढ़ने लगी हैं दूरियाँ, तुम्हें लौट आना चाहिए।।

जो जरा सी जिंदगी बाकी, मुहब्बत में लुटाना चाहिए।
जहाँ मिलता सुकून दिल को, वहीं दिन बिताना चाहिए।।

अंधेरे दिल में जा कर के, कोई दीपक जलाना चाहिए।
बहुत तन्हाई रुलाती है, कि अब संग मुस्कुराना चाहिए।।

जो मैं फिर गुनगुना पाऊँ, अधर में गीत आना चाहिए।
हाँ फिर से वही मधुरिम प्रिये, संगीत आना चाहिए।।

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़।

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