कहानी : वह कुम्हार – आर के तिवारी सागर

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वह कुम्हार

दीपावली का त्यौहार आने वाला था शहर में दीपावली की पूजन की सामग्री से बाजार सजा हुआ था, तरह-तरह की फूल मालाएं, बिजली की लड़ियां, बल्ब, रंग,कलर पेन्ट की दुकानें,बर्तनों की दुकानें, वस्त्रों की दुकानें, सोने चांदी के आभूषणों से सजी दुकानों से बाजार जगमगाया हुआ था। शहर के हर क्षेत्र में बाजार लगे हुए थे एक क्षेत्र में कुम्हार भी अपने-अपने सामान को बेच रहे थे जिनमें मिट्टी के दीए, ग्वालन, घोड़ा, चक्की, डबुलियां, मिट्टी की मूर्तियां आदि सामान दुकानों में बिक्री के लिए रखा हुआ था मैं भी दीपावली के दो दिन पहले दिए, ग्वालन वगैरा लेने बाजार गया जहां कई कुम्हार अपनी दुकानें लगाये थे तभी अचानक मुझे किसी ने आवाज दी जिस ओर से आवाज आई मैं उस ओर देखने लगा मुझे लगा कि किसी ने मुझे ही जीजा, शब्द के उच्चारण के साथ बुलाया था। मैंने देखा एक लड़का करीब पैतीस वर्ष का हाथ उठाकर मुझे अपनी ओर बुला रहा था। मैंने गौर से देखा वह कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था, उसके पास एक महिला शायद उसकी पत्नी होगी एवं दो बच्चे भी बैठे थे ।मैं उसकी ओर चला गया मैंने वहां देखा हाँं वह लड़का थोड़ा जाना पहचाना था फिर याद आया मेरे छोटे भाई की शादी उसी के मुहाल में हुई थी जहां यह मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोग रहते हैं उसी कारण उस लड़के ने मुझे जीजा शब्द कहकर बुलाया था मुझे थोड़ा अच्छा लगा मैं मुस्कुराया मुस्कुरा कर मैंने कहा क्या हाल है भाई, वह बोला ठीक है वह मुझसे बीच में बोला कितने दिए रख दूं, ग्वालन कौनसी उसने एक उठा कर मुझसे पूछा यह रख दें फिर घोड़ा भी पूछा सभी सामान मुझे बतला कर उसने रख दिए मैंने सारा सामान लेकर उससे कहा तीस दिए छोटे वाले और रख दो तब उसने छाट छाट कर अच्छे-अच्छे दिए रख दिए सामान पूरा हो जाने पर मैंने पूछा भाई पैसे कितने हुए तब वह बोला आपसे क्या भाव ताव करना जो देना हो दे दो मैं थोड़ा विस्मित सा हुआ मैं बोला अरे बताओ कितना होता है जितना होता है बोलो मैं एक ओर उसके फटे हाल कपड़े और गरीबी देख उस पर तरस खा रहा था तो दूसरी ओर सोचता अपने मन से क्या? दें पता नहीं कौन सी वस्तु कितने पैसे में बेच रहा है मेरा भी पैसा अधिक नहीं लगना चाहिए। मेरे द्वारा फिर पूछने पर उसने मुझसे कहा जीजा जी सबके पैसे तो नब्बे रूपये होते हैं आप जो चाहें दे दो मैंने कुछ सोचा फिर उसे सत्तर रूपये दे दिए उसने पैसे हाथ में लिए और एक क्षण के लिए उसने पैसों को देखा फिर मुझे देखा मैंने देखा उसके चेहरे पर तसल्ली के भाव नहीं दिख रहे थे। मैंने अपना सामान अपनी थैली में रखा और चल दिया समय अधिक और सामान भी अधिक हो गया था इसलिए मैं सीधा घर आ गया सामान पूजा के कमरे में रख हाथ मुंह धोया और टीवी देखने लगा पर मेरा ध्यान उसके द्वारा पैसा लेते समय दो पल को उसके चेहरे पर आए भावों पर जा रहा था मैं घर तो आ गया था, पर मन में बेचैनी बनी रही मुझे चिंता में देख मेरी पत्नी ने पूछा क्या बात है? क्या सोच रहे हो?पहले तो मैंने कुछ नहीं कहा, टाल दिया, पर फिर पूछने पर मैंने पूरा किस्सा उन्हें बतला दिया जिस पर वे बोलीं अरे आप भी कहां क्या-क्या सोचते हो अरे उनका (दुकान वालों का) ऐसा ही होता है हर ग्राहक मुंह मांगा पैसा नहीं देता उनके समझाने से मुझे थोड़ी शांति सी महसूस हुई पर रह रह कर उसका मासूम चेहरा उसकी पत्नी जो पास ही सामान्य सी मैली साड़ी में बैठी थी एवं दो बच्चे मट मैले कपड़े पहने खुले में बैठे अपना सामान बेच रहे थे मुझे बेचैन सा कर रहे थे। घर में पूजा का माहौल था आज शाम को धनतेरस की पूजा होनी थी बच्चों ने लाए हुए दियो में से तेरह दिए पूजा के लिए निकाल लिए शाम को स्वच्छ होकर मैं पूजा करने बैठा मेरी पत्नी और बच्चों ने पूजन की सारी सामग्री लगा रखी थी साथ में कुछ स्वर्ण, चांदी के आभूषण कुछ चांदी के सिक्के कुछ नगदी नए बर्तन जो आज की पूजन के लिए खरीदे थे सारी व्यवस्था पत्नी ने कर दी थी पर उस समय मेरा ध्यान दियों की ओर गया और उन पर टिक गया जिन्हें देख लगा कुछ अच्छा नहीं हुआ है, हाँं पर पूजन हुई जिसके बाद परिवार और मैं अपने अपने काम से लग गए दूसरे दिन चौदस को भी मन बेचैन रहा, अचानक मेरे मन में एक विचार आया और मैं स्नान कर के बाजार की ओर निकल गया मैं घूमते घूमते उसी ओर गया जहां उस दिए वाले कुम्हार की दुकान लगी थी पर मैंने देखा वह दुकान पर नहीं था ना ही उसकी पत्नी ही थी हां एक करीब साठ- पैंसठ वर्ष की बूढ़ी महिला पुरानी सी साड़ी पहने बैठी थी मैं अपनी गाड़ी एक ओर खड़ी कर उसके पास गया मैंने उससे पूछा अम्मा भैया कहां है? वह बोली बेटा वह रोटी खाने गया है दो बजे तक आएगा वह बोली आपको क्या लेना है। मैंने कुछ नहीं कहा और वापस चला आया घर आकर मैं अन्य कार्य में लग गया दूसरे दिन दीपावली थी पूरे परिवार के साथ पूरी विधि विधान से मां लक्ष्मी का पूजन किया बच्चों ने पटाखे फोड़े यहां वहां पड़ोस में मिठाई प्रसाद बांटा पर मेरा मन कहीं न कहीं खिन्न था पटाखे मिठाइयां देख बार-बार लग रहा था हजारों रुपए इन पर खर्च कर दिए पर बेचारे उस गरीब कुम्हार को जिसमें एक अपनापन था जो पहचान के बदले अपना कुछ सामान बेचना चाहता था पर लगता है, उसे इसके बदले फायदा कम मिला यह मिला ही नहीं यह बेचैनी मेरे मन में निरंतर बनी रही एक दिन फिर मैं उस ओर गया पर वहां इतनी दुकानें नहीं लगी थी दीपावली के कारण दो,चार दिन का इनका धंधा रहता है हाँ एक दुकान जरूर लगी थी जिस पर थोड़े से दिए बगैर ही रखे थे मैंने जाकर उस दुकानदार से पूछा कि यहां वो लड़का दिए बेचता था, आज क्यों नहीं आया। तब वह बोला बाबूजी ग्यारस को आएगा अब चार-पांच दिन धंधा रहता नहीं सो और भी दुकान वाले उस दिन अपनी-अपनी दुकानें लगाएंगे यह सुनकर मुझे कुछ अच्छा लगा सोचा चलो ग्यारस को उसकी दुकान लगेगी। मैं ग्यारस का इंतजार बड़ी बेचैनी से करने लगा, ग्यारस के दिन में गन्ना वगैरा लेने उसी ओर गया जहां उसकी दुकान लगी थी दूर से देखा वह भी बैठा था पास ही उसकी पत्नी उसके बच्चे भी बैठे थे मुझे जाने क्यों उसे देख थोड़ा अच्छा लगा उसने शायद मुझे देख लिया था पर ये क्या ?मैंने देखा उसने मुझ में ज्यादा रुचि नहीं ली थी शायद सोचा होगा कि दीपावली को तो सब सामान ले गये थे अब कुछ नहीं लेंगे इसलिए ध्यान नहीं दे रहा या, मैंने सोचा शायद रुखा सा व्यवहार कर रहा है क्योंकि मुझसे उसे लाभ नहीं हुआ था पर मैं सीधा उसी के पास गया मैं उससे बड़े प्रेम से बोला कहो कंछेदी कैसे हो वह थोड़ा मुस्कुरा कर बोला ठीक है जीजा जी आज तक और ऐ सामान बिकता है, इसलिए दुकान लगाई है। इतना कह उसने दूसरी ओर ध्यान कर लिया मैंने सोचा मैं अब अपने मन का मैल धो लूं उसके बच्चों की ओर देख मैं बोला यह तुम्हारे बच्चे हैं वह बोला हां जीजा जी मैंने तुरंत दस-दस रूपये के दो नोट निकाले और बच्चों को दे कर कहा लो बेटा, चॉकलेट बिस्कुट ले लेना जिसे देख वह बीच में तुरंत बोला अरे रहने दो जीजा जी पर ये क्या? अचानक उसके व्यवहार में इतनी आत्मीयता देख चकरा गया मैं पर उसकी प्रसन्नता देख मुझे एक आत्मशांति अवश्य मिली वह तुरन्त अपने बच्चों से बोला अरे चलो उठो जीजा जी के पैर पढ़ो, जिसे देख मैं मन ही मन मुस्कुराता हुआ अपने आपको धन्यवाद देता हुआ अपने घर की ओर आ गया घर पर पत्नी ने भी देखा कि मैं बाजार से कितना खुश आया हूं ।
और फिर शाम को ग्यारस की पूजन धनतेरस और दीपावली की पूजा से भी अच्छी महसूस हुई मुझे। आज मेरी आत्मा में बहुत शांति थी मुझे लगा आज की रात नींद भी बहुत अच्छी आएगी।

आर के तिवारी
सागर

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