काव्य भाषा : मुझे गाँव रहने दो – बिन्दु त्रिपाठी भोपाल

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मुझे गाँव रहने दो

खोखले हो गए हैं रिश्ते और नाते,
स्वार्थ मे जीते हैं, तुम्हारे शहर के लोग ।
रिश्तों को सूखने से बचाने,
थोड़ी सी छाँव रहने दो ।
मै गाँव हूँ, मुझे गाँव रहने दो ।
कोई किसी को जानता पहचानता नही,
अपनो को अपने करीब ले आता है ।
घरों से घरों की दूरियाँ, जमीन आसमान की हो गईं ।
यहाँ जमी पर रहने की थोड़ी सी ठाँव रहने दो ।
मै गाँव हूँ, मुझे गाँव रहने दो ।
तुम्हारे शहर के अंदाज ही निराले हैं,
घर मे शानो-शौकत है, दौलत और शोहरत है,
मकान है, दीवार है, छोटा परिवार है ।
सब कुछ है, लेकिन घर घर नही है ।
मै छोटा सही, बड़ा दिल रखता हूँ ।
आसमाँ मे नही उड़ता, जमी पर रहता हूँ ।
मुझे अपने जैसा न बनाओ,
जमी पर मेरे पाँव रहने दो ।
मै गाँव हूँ, मुझे गाँव रहने दो ।

बिन्दु त्रिपाठी
भोपाल
मध्यप्रदेश

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