नार्वे से शिक्षक दिवस पर परिचर्चा और अंतर्राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी का आयोजन

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नार्वे से शिक्षक दिवस पर परिचर्चा और अंतर्राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी का आयोजन

सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की कहानी ‘मदरसे के पीछे’ एक कालजयी कहानी है.
शिक्षक दिवस पर नार्वे के प्रतिष्ठित साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की कहानी ‘मदरसे के पीछे’ का पाठ और परिचर्चा आयोजित हुई। जिसमें प्रसिद्ध समालोचक शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में कहा कि सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की कहानी ‘मदरसे के पीछे’ एक कालजयी कहानी है।

नीदरलैण्ड के डॉ. मोहनकान्त गौतम ने मदरसे के पीछे को एक सशक्त कहानी कहते हुए राय दी कि इस पर लेखक को उपन्यास लिखना चाहिए। कहानी से पता चलता है कि सैकड़ों साल से अफगानिस्तान में बहादुर और बलिष्ट लोगों ने अपनी ऊर्जा किसी ऐसे कार्य में नहीं लगाई जिस पर दुनिया गर्व कर सके।

इला श्री जायसवाल ने कहा कि सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक’ ने महिलाओं की जिस स्थिति का वर्णन कहानी में किया है जिसमें उसे अपने अधिकार नहीं है। वह केवल पुरुष के इशारे पर नाचती रहे यह तो घोर अन्याय है। अकेले समाज में स्त्री का रहना कितना कठिन है। यह भी हमको इस कहानी से पता चलता है और ऐसी पुरुष सत्ता जो कहीं न कहीं पंगु है इस कहानी में पता चलता है। हमारे समाज में एक चरित्रवान स्त्री को चरित्रहीन कह देना कितना आसान है।

कार्यक्रम की सफल संचालिका सुवर्णा जाधव ने कहानी को एक अच्छे शिल्पकार की कहानी बताया | स्त्री की गवाही तक की कोई कीमत नहीं है धार्मिक रूढ़िवाद और महिलाओं को दोयम नहीं तीसरे और चौथे दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाता है।

डॉ. रश्मि चौबे ने कहानी को प्रेरणात्मक बताया और कहा कि लेखक मानवता का धर्म स्थापित करना चाहता है जहाँ महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक न समझा जाये।

बलराम अग्रवाल ने कहा कि कहानी में दोसाबीन युवक के हाथ में मशीनगन दिखाई गयी है वह 20 साल पहले की कहानी में अफगानी लोगों के पास शायद पहुँची नहीं थी पर डॉ. मोहनकान्त गौतम ने इसका जवाब दिया कि उस समय रूस द्वारा ये मशीनगनें अफगानियों के पास बड़ी मात्रा में आ चुकी थीं।
कृपाशंकर ने कहा कि 20 साल पुरानी सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की कहानी ‘मदरसे के पीछे आने वाले 20 साल बाद भी उतनी ही सामयिक रहेगी। कृपाशंकर ने आगे कहा कि मदरसे के पीछे कहानी में लेखक ने हिन्दी के शब्द ही प्रयोग किये हैं। अतः इसे अपडेट करने की जरुरत है। इसपर बलराम अग्रवाल ने कहा कि कहानी को अपडेट नहीं किया जा सकता वरना वह अपने समय के साथ कैसे न्याय करेगी जिस समय लेखक ने लिखा है|
डॉ. मुकेश मिश्र ने कहा कि कहानी पूर्ण है, यह एक ऐसी हिन्दी कहानी है जिसे प्रेमचन्द, गंगा प्रसाद विमल आदि की कहानियों की तरह याद किया जाएगा।
सुवर्णा जाधव ने कहा कि मैंने इस कहानी का अनुवाद मराठी में किया है. सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की दृष्टि व्यापक है. उन्होंने पहले सभी स्थितियों को समझा, आपदा और देखा और उन्हें संज्ञान में लिया और तब लिखा है. महिलाओं की दशा को दर्शाती बहुत मर्मस्पर्शी कहानी है. सुवर्णा जाधव ने कहानी को एक अच्छे शिल्पकार की कहानी बताया और कार्यक्रम का बहुत अच्छा संचालन किया।
डॉ. शोभा बाजपेयी ने कहा कि यह कहानी किसी एक देश का वर्णन नहीं करती है. यह सभी देशों के लिए उपयुक्त है। सभी रसों से भरपूर कहानी है, वात्सल्य रस, है, करूण रस है, वीभत्स रस, वीर रस भी है। यह कहानी ने सवाल उठाती है कि युद्ध हम करते ही क्यों हैं? सरहदों की लड़ाई क्यों है? स्त्री की आवाज को उठाती यह कहानी मानवीय मूल्यों की वकालत करती है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ. कृष्णजी श्रीवास्तव के अनुसार लेखक ने दो दशक पहले कहानी का आधार बनाया था।
लेखक शरद आलोक सामामजिक परिवर्तन के फलस्वरूप जो भी उत्पन्न गहरी मनोवैज्ञानिक परिवर्तन की सूक्ष्म समस्या होती है उसकी वह पड़ताल अच्छी तरह करते हैं। आज के परिवेश में हम देखते हैं अलगाव, अजनबीपन, भय, संत्रास आदि की कोई सीमा ही नहीं है। आज जितना भी लिखा जा रहा है वह नकारात्मक पहलू उसमें झलकता है लेकिन कुछ साहित्यकार ऐसे हैं वास्तव में जिनके साहित्य में सकारात्मकता बड़ी खूबी के साथ दिखाते हैं। शरद आलोक जी भी यही दिखाते हैं। भातीय संस्कृति के साथ ही विदेशी वातावरण और विदेशी अनुभवों के जानकार होने के कारण सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक जी वैश्विक धरातल के बहुत अच्छे साहित्यकार हैं। मदरसे के पीछे कहानी की जहाँ तक बात है इसमें शरद आलोक का भावबोध प्रखर संचेतना के रूप में बखूबी झलकता है।
निसंदेह शरद आलोक जी ऐसे यथार्थवादी रचनाकार हैं जो सम -सामयिक परिस्थितियों में व्यक्ति या जो भी चरित्र है उसकी मानसिक और भावात्मक स्थिति को एक नए कलेवर में आकलित करते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि मदरसे के पीछे में उनका अनुभव जगत अत्यंत व्यापक है कल्पना और अवधारणा के अनुसार ही वह कथानक में मानवीय विवशता या दुर्बलताओं का चित्रण ही नहीं बल्कि जड़ रूढ़ियों पर आघात करने की संचेतना को बखूबी उभारते हैं।
काव्यपाठ
भारत से काव्यपाठ करने वालों में दिल्ली से प्रमिला कौशिक, लखनऊ से नीरजा शुक्ला और डॉ. करुणा पांडेय, मेरठ से डॉ. राम गोपाल भारतीय, कोलकाता से डॉ. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड,नार्वे से गुरु शर्मा और नार्वेजीय भाषा में अपनी कवितायें सुनायीं | सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक ने उसका अनुवाद भी सुनाया। न्यू जर्सी अमेरिका से राम बाबू गौतम और स्वीडेन से सुरेश पांडेय ने अपनी कवितायें सुनायीं।

इस कार्यक्रम में श्री रजनीश त्रिवेदी, राष्ट्र किंकर साप्ताहिक के सम्पादक विनोद बब्बर, डॉ. राम गोपाल भारतीय, डॉ. अर्जुन पांडेय जी उपस्थित थे।

अंत में साहित्य त्रिवेणी पाक्षिक साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक डॉ. वीर सिंह मार्तण्ड जी ने सभी को धन्यवाद दिया, कार्यक्रम की समीक्षा की और अपनी कविता पढ़ी
‘मदरसे के पीछे’ के बहाने कुछ ख़ास बातें
सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ की कहानी ‘मदरसे के पीछे’ के बहाने कुछ ख़ास बातें निम्नलिखित हैं।
मदरसे के पीछे यह अभी भी नेट पत्रिकायें पूर्णिमा वर्मन के सम्पादन में अभिव्यक्ति और मनीषा कुलश्रेष्ठ के सम्पादन में निकलने वाली नेट पत्रिका हिन्दीनेस्ट में पढ़ने को मिल सकती हैं। जो सन् 2001 में छपी थीं।
यह कहानी कादम्बिनी के अलावाा, भारत की पत्र-पत्रिकाओं, ब्रिटेन की पत्रिका, नार्वे की पत्रिका और लखनऊ के अखबार में 15-20 साल के दौरान छपी है।
इस कहानी पर लघु फिल्म बनायी है लखनऊ के नाट्य और फिल्म निर्देशक फिल्माचार्य आनन्द शर्मा जी ने।
जो यू ट्यूब में गुमराह नाम से या मेरे नाम Suresh Chandra Shukla से खोजने पर मिल जायेगी।
इस फिल्म में काम किया है मशहूर कलाकार जमील खान (भोजपुरी और हिन्दी फिल्म), योगेंद्र विक्रम सिंह (बॉलीवुड) और प्रिय मिश्रा ने जो इसके मुख्य कलाकार हैं, जिन्होंने बॉलीवुड और भोजपुरी फिल्मों में अपना स्थान बनाया है।

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