काव्य भाषा : समर्पण – संगम त्रिपाठी बिरसिंहपुर

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समर्पण

सुनो सुनो कविता सुनो
ज्ञानदायनी भण्डार है,
सरस्वती की उपासना
शब्द का संसार है।
सत्ता के मठाधीशों के
विरोध का शंखनाद है,
ज्वलंत मुद्दों पर
साधकों का सिंहनाद है।
नौनिहालों के वात्सल्य का
अटूट प्रेम की झंकार है,
रुपसी नवयौवना के
रुप का श्रृंगार है।
कविता कालिदास के
मेघ की रसधार है,
मीरा के झंकृत वीणा की
सुमधुर अलौकिक तार है।
समाज में फैली विकृति का
चलता फिरता दर्पण है,
भक्त का भगवान के
प्रति लिखित समर्पण है।

कवि संगम त्रिपाठी
बिरसिंहपुर

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