काव्य भाषा : करो प्रभात गान, दिनकर उठता -डॉ ब्रजभूषण मिश्रा भोपाल

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करो प्रभात गान, दिनकर उठता

करो प्रभात गान, दिनकर उठता
नभ को रँगता,छुपता,छुपता
तम को हरता, हरता,
दिखता
हुआ दिन प्रकाशवान,दिनकर दिखता

हरियाली सजा ,लेटी है धरा
लालिमा, लगती,देती पहरा
पुष्प लजाते ,दिखते,
सफेद
लगता,खोलेंगे निशा का भेद

कलरव करते दिखेंगे,अब विहग वृन्द
उड़ते उड़ते ,लिखेंगे वे नव छन्द
जन जन ,जग में जग जावेंगे
ब्रज,भजन मंदिर,सब गावेंगे

डॉ ब्रजभूषण मिश्रा
भोपाल

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