काव्य भाषा : खामोशी का शुक्रिया – ऋतुराज वर्षा रांची

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खामोशी का शुक्रिया

खामोशी ने फिर से जीने का मतलब सीखा दिया।
तन्हा दिल ने खुश रहने के लिए बहुत जतन किया।
मानो,मेरे लब पर लफ्जों का फसाना सजा दिया।
सहसा अरमानों के पंख लग गये,
हम गुस्लिता में फिर खिल गये।
एक नहीं, कई वजह जीने के मिल गये।
खामोश और दबे कुचले भावनाओं के फिर नीर बन गये।
हमने थोड़ा मांगा और चाहत के मुकाम मिल गये।
भरोसा और अंदाज से किस्मत ने ज्यादा दे दिया।
खामोशी ने फिर से जीने का मतलब सीखा दिया।
इल्म नहीं थी सबको परखने की,
भाव-भंगिमाओं को पहचानने की।
इसलिए कीमत हमेशा अरमानों का हमने लगा दिया।
खामोशी ने फिर से जीने का मतलब सीखा दिया।
बड़ा एहसान, बहुत शुक्रिया खामोशी का, हमें अदब से जीने का सलीका बता दिया।
खामोशी ने फिर से जीने का मतलब सीखा दिया।

ऋतुराज वर्षा
रांची

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