काव्य भाषा : ब्रज धाम में – स्वधा रवींद्र ‘उत्कर्षिता’ लखनऊ

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ब्रज धाम में

चिरप्रतीक्षित नयन ढूंढते
श्याम को आज ब्रज धाम में।

जल की गगरी लिए घाट पर
वो खड़ी की खड़ी रह गयी
दूहते दूहते गाय को
वो वहीं पर पड़ी रह गयी
इस तरह था हृदय श्याम मय
न लगा वो किसी काम में।

चिरप्रतीक्षित नयन ढूंढते
श्याम को आज ब्रज धाम में।

एक दिन बन्द पलकें लिए
श्याम को देखती रह गयी
वो कुंवारी उसी रोज फिर
एक सुहागन सी सब सह गयी
माँग सूनी रही उम्र भर
चक्र आठों थे घनश्याम में

चिरप्रतीक्षित नयन ढूंढते
श्याम को आज ब्रज धाम में।

सीख ली थी कलाएं सभी
चंद्रमा सी बढ़ी और घटी
सब अहम त्याग कर राधिका
सिर्फ कान्हा के रस्ते चली
न दिवस रात देखा कभी
वो चली छांव में घाम में

चिरप्रतीक्षित नयन ढूंढते
श्याम को आज ब्रज धाम में।

स्वधा रवींद्र ‘उत्कर्षिता’
लखनऊ

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