काव्य भाषा : रूक्मिणी का हाल -सरस्वती कुमारी पटना

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रूक्मिणी का हाल

रूक्मिणी के दिल का हाल कोई न जाने,
जिए रूक्मिणी किसके सहारे,
कृष्ण की वंशी तो सिर्फ राधा- रानी पुकारें।
सांवरे के नैना तो राधा को ही निहारे,
जिए रूक्मिणी अब किसके सहारे।
ए सखि मुझे ऐसे सजाना जैसे राधा सजती है,
मुझे भी मनमोहक बना दे, जैसे राधा लगती है।
कृष्ण की नजर कभी तो मुझ पर पड़े,
कृष्ण के नैना मेरे नैनों से लड़ें।
कभी तो सांवरे मुझे भी निहारे,
जी लूंगी मैं उस एक नज़र के सहारे।
रूक्मिणी की पीड़ा कोई न जाने,
जिए रूक्मिणी किसके सहारे,
कृष्ण की वंशी तो राधा राधा पुकारें।
मुरलीधर को है सारे जगत का ज्ञान,
कैसे रहते रूक्मिणी की पीड़ा से अंजान।
कान्हा मन्द- मन्द मुस्कुराए,
और रूक्मिणी को बुलवाएं।
बोलें रूक्मिण! राधा जान है तो तुम जहांन हों,
राधा मान है तो तुम सम्मान हों।
राधा मित्रता है तो तुम संगिनी हों,
राधा प्रेम है तो तुम अर्धांगिनी हो।
कान्हा की बातें न रूक्मिणी को भाया,
बोली कृष्ण मैं जानूं तेरी माया,
तेरे अंदर तो सारा जग है समाया,
फिर मेरे लिए तुमने कौन सा स्थान है बनाया।
कृष्ण बोले, रूक्मिणी तुम्हें तो मैंने जीवन में स्थान दिया है,
और कौन सा स्थान चाहिए,
तुम जिंदगी में शामिल हो यह काफी नहीं,
तुम्हें और कौन सा जहांन चाहिए।
मुझे दिल में स्थान चाहिए जहां राधा रहतीं हैं,
क्यूं राधे कृष्ण सारी दुनिया कहती हैं।
प्रेम एक बार होता है रूक्मिणी बार बार नहीं,
प्रेम तो समर्पण है, व्यापार नहीं,‌
इसलिए रूक्मिणी न पड़ों इस उलझन में,
सुख भोगो जो सुख है समर्पण में।
पर रूक्मिणी की पीड़ा कोई न जाने,
कृष्ण उसके होकर भी है अंजाने।
रूक्मिणी के दिल का हाल कोई न जाने,
जिए रूक्मिणी किसके सहारे,
कृष्ण की वंशी तो राधा रानी पुकारें।

सरस्वती कुमारी
पटना

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