विविध : तुलसी के राम – ए۔ एम सक्सेना , दतिया

तुलसी के राम

भगवान राम गोस्वामी तुलसीदास जी के इष्ट देव है । बे भगवान विष्णु के अवतार है ।जन्म के समय भी वह चतुर्भुज रूप में ही प्रकट हुए ।

“भए प्रगट कृपाला दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी ॥

लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी ॥ ”
फिर कौसल्या के अनुरोध पर शिशु रूप में आए ।
बाल्मीकि ने राम को विष्णु का ही अवतार कहा है ।
“प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोक नमस्कृतम् ।
कौसल्याजनद् रामं दिव्यलक्षण संयुतम् ।।10/18/1।। ”
कौशल्या देवी ने सर्व लोक बंदित जगन्नाथ श्री राम को जन्म दिया । जो उन्होंने 13 वे व 14 वे श्लोक में और
सपष्ट कर दिया है ।
” भारतो नाम केकय्यां जज्ञे सत्य पराक्रम: ।
साक्षाद् विष्णुश्चतुर्भागों सर्वे समुदितोगुणै: ।।13/18/1।। ”
वाल्मीकीय व अध्यात्म रामायण में जन्म के बाद ईश्वरीय सत्ता की बात स्तुतियों के अलावा कही नही किया गया । पर तुलसीदास जी ने राम को परब्रह्म के रूप में कई बार दिखाया है । शिवचरित्र में जब सती ने सीता का स्वरूप बनाकर राम की परीक्षा ली । और उन्हें
विधिवत नमन कर शिव के बारे में पूछा और सती को ऊहापोह से उबारने अपनी हेतु अपनी प्रभुता का दिग्दर्शन कराया जिसमें उन्हें विष्णु और शिव से पूज्य दिखाया ।

देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका।
अमित प्रभाउ एक तें एका॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा।
बिबिध बेष देखे सब देवा॥
भावार्थ:-सतीजी ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जो एक से एक बढ़कर असीम प्रभाव वाले थे। (उन्होंने देखा कि) भाँति-भाँति के वेष धारण किए सभी देवता श्री रामचन्द्रजी की चरणवन्दना और सेवा कर रहे हैं॥
वह श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय 15 के श्लोक 17-18 मैं बर्णित उत्तम पुरुष है ।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ (१७)

इन दोनों (क्षर ، अक्षर के ) अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ (१८)

मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ ।
वास्तव में यहां गोस्वामी जी ने यहाँ पौराणिक शैली अपनाई है । सनातन साहित्य में यह मान्यता है कि चैतन्य अंश में अंशी के सभी गुण धर्म मौजूद होते हैं । ब्रह्मा विष्णु व शिव परम ब्रह्म के ही रूप या अंश है । तुलसी दास जी ने भी राम में परत्पर ब्रह्म की सत्ता दर्शाई है। जो अन्य ग्रंथों में नहीं दिखाई गई।
बाल्मीकि आदि कवियों ने राम को जन्म और स्तुतियों के अलावा मनुष्योचित गुणों से युक्त दिखाया है ।
तुलसीदास जी ने उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया है । वैसे तो वे समस्त सदगुणों से अलंकृत है जिनका वर्णन कठिन है । पर हम उन्हें सुख-दुख से अप्रभावित आदर्श मानव ، आज्ञाकारी पुत्र ،आदर्श राजा ، आदर्श पति के रूप में मात्र एक- एक उदाहरण से चर्चा करते हैं ।
1) सुख दुख में सम आदर्श मानव – सुख दुख से अप्रभावित रहने वाली मानव जबराज्य दैने की जगह उन्हे वनबास दिया गया तब तुलसीदास ने लिखा है
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान॥51॥

श्री रामचंद्रजी का मन नए पकड़े हुए हाथी के समान और राजतिलक उस हाथी के बाँधने की काँटेदार लोहे की बेड़ी (अलान के) समान है। ‘वन जाना है’ यह सुनकर, अपने को बंधन से छूटा जानकर, उनके हृदय में आनंद बढ़ गया है॥51।
2 आज्ञाकारी पुत्र – जब श्री राम को वनवास मिला उन्होंने के पालन में प्रसन्नता दिखाते हुए कहा
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥4॥
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों का अनुरागी (पालन करने वाला) है। (आज्ञा पालन द्वारा) माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र, हे जननी! सारे संसार में दुर्लभ है॥4॥
3) आदर्श राजा – रामराज्य आज भारत के जनमानस का व महात्मा गांधी का सपना था क्योंकि श्री राम एक एसे
आदर्श राजा थे जिने राज्य में दंड की आवश्यकता ही समाप्त हो गई हो व नागरिकों में भेदभा न था ।
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥22॥

श्री रामचंद्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचने वालों के नृत्य समाज में है और ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही सुनाई पड़ता है (अर्थात् राजनीति में शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदि को दमन करने के लिए साम, दान, दण्ड और भेद- ये चार उपाय किए जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिए दण्ड किसी को नहीं होता, दण्ड शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। भेद, शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कामों में आता है।)॥22॥
4) आदर्श पति के रूप में
श्री राम ने सीता का सदैव ख्याल रखा मानस में कई प्रसंग आये है पर यहाँकवितावली के दो प्रसंग
पुर ते निकसी रघुवीर वधू
पुर ते निकसीं रघुबीर बधू धरि धीर दए मग में डग द्वै।
झलकी भरि भाल कनीं जल की पुट सूखि गए अधराधर वै॥
फिर बूझति हैं चलनों अब केतिक पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै।
तिय की लखि आतुरता पिय की अखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै॥
जल कों गए लक्खनु, हैं लरिका,परिखौ, पिय! छाँह घरीक ह्वै ठाढ़े।
पोंछि पसेउ बयारि करौं , अरु पांय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े।
तुलसी रघुबीर प्रिया-श्रम जानि कै ,बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।
जानकी नाहकौ नेहु लख्यौ,पुलकौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।
प्रभु श्री राम के गुण अनंत है सभी महत्व पूर्ण पर हमने केवल कुछेक की संक्षिप्त चर्चा की । संततुलसीदास गोस्वामी जी ने भगवान राम के आदर्श जन जन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया उन्हें नमन ।

ए۔ एम सक्सेना
हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी ، भांडेर रोड
दतिया ( म ۔ प्र ۔)