संस्मरण : गुबार – ललिता नारायणी प्रयागराज

गुबार

सन् 86 की बात है । हम आगरा कॉलेज से एलएलबी अंतिम वर्ष की परीक्षा देकर अपने गांव वापस आ रहे थे । हमें गांव आने के लिए शिकोहाबाद से दूसरी बस पकड़नी थी , हम पहले ही लेट हो चुके थे , और शिकोहाबाद बाली अंतिम बस जा चुकी थी , …..
सूर्य अस्त हो रहे थे अंधेरा बढ़ता जा रहा था । बस स्टैंड पर कुछ लोग ही दिखाई दे रहे थे , वह भी बड़ा अजीब नजरों से देख रहे थे , हम दोनों भाई बहन‌ की घबराहट बढ़ती जा रही थी , कि अचानक भाई को याद आया ,….. बोला दीदी अपने गांव के तिवारी जी यही पास में ही रहते हैं , चलिए उन्ही के घर चलते हैं ।
और कोई विकल्प नहीं था सो हमने बहुत धीमे से हां में सिर हिलाया और पैदल ही उनके घर के लिए रवाना हुए ।
हम आगे बढ़ रहे थे पैर हमारे पीछे लौट रहे थे …. हमें दस साल पहले की एक घटना याद आई जब हम और उनकी बेटी सुषमा साथ साथ पढ़ते थे ।
एक दिन किसी बात पर लड़ाई हुई और हम दोनों अलग हो गए , उस दिन के बाद हम सुषमा से कभी नहीं मिले , तिवारी अंकल पापा के बहुत अच्छे दोस्त थे उन्हीं के द्वारा सुषमा की खबर मिलती रहती थी , उनके द्वारा ही हमें पता चला था कि सुषमा पीएचडी कर रही है …… रास्ते भर बड़े अजीबोगरीब ख्याल दिल में आते रहे ….पता नहीं बोलेगी भी कि नहीं , कैसा व्यवहार करेगी , कहीं बेइज्जती ना करे‌ आदि-आदि ……
थोड़ी देर में हम उनके दरवाजे पर थे …भाई ने कॉल बेल बजाई दरवाजा तिवारी अंकल ने खोला भाई ने पूरी बात बताई ।
बड़े ही आदर और स्नेह से उन्होंने बैठक में बैठाया और सुषमा को आवाज लगाई ,पता नहीं क्यों मुझे डर सा लग रहा था अब क्या होगा ….
थोड़ी ही देर में सुषमा ने कमरे में प्रवेश किया , इतने दिनों बाद भी मैंने तुरंत ही पहचान लिया … वो पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत स्मार्ट लग रही थी ,
हमें देखते ही खुशी से चीख पड़ी और ,हाय ..रे….ललिता …
कहती हुई दोनों बाहें पसार कर , गले से लग गई । हम दोनों की आंखों से सावन की झड़ी लगी थी
बाहर खूब तेज बारिश हो रही थी । सारा गुबार धुल चुका था , इसी समय उसकी बूढ़ी नौकरानी गरमा गरम चाय और पकोड़े लेकर आ गई , बचपन की बिछड़ी हुई दोस्त को पाकर जाने क्यों ऐसा लग रहा था , हम सीधे स्वर्ग में बैठे हैं , और चाय नहीं अमृत पी रहे हैं …..

ललिता नारायणी
प्रयागराज

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here