काव्य भाषा : पगडण्डी चल पड़ी,पैदल बरसात -डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

पगडण्डी चल पड़ी,पैदल बरसात

काले बादलों से, आस लिए खेत
बीजों के अंकुरण ,की प्यास लिए ,खेत
सजग प्रहरी से,खड़े संतरे के बाग
सावन की अंगड़ाई और मौसम रहा जाग

पगडंडी चल पड़ी,पैदल बरसात
बारिश आँक रही,धरती की प्यास
बरसने को बदरा, दिख रहे उद्यत
बिजुरिया ,मेघों में छुप रही सतत

बरसो,मेघा अब जम के बरसो
अब न करो तुम ,कल या परसों
होने दो अंकुरण,ये धरा हरषाए
ब्रज,चले शीतल बयार,हरीतिमा लहराए

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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