काव्य भाषा : ग़ज़ल – कामनी गुप्ता जम्मू

ग़ज़ल

रिश्तों में फासला और सुना होगा,
जब अपनों ने गैरों को चुना होगा।

गलतफहफियां दरम्याँ बढ़ती रहीं,
जाल दुशमनों ने ऐसा बुना होगा ।

घर की मर्यादा न भंग हो जाए कहीं,
बुजुर्गों ने रास्ता बीच का चुना होगा।

फर्क बस सोच का होता है जो देखो,
अपनों ने सच को न गौर से सुना होगा।

चलो बढ़ाएं कदम दो अपनों की खातिर,
बेमतलब बातों ने कानों को भुना होगा।

कामनी गुप्ता
जम्मू

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