काव्य भाषा : थोड़ा सा प्यार लुटाओ तो – सुषमा दीक्षित शुक्ला लखनऊ

थोड़ा सा प्यार लुटाओ तो

जीने का मजा तो आता है ,
औरों के खातिर जीने में ।
कितना सुकूँ मिल जाता है ,
औरों के आँसू पीने में ,,,,।
ओ हो हो हो ओ हो हो हो,,,,,,3

ये जीना भी क्या जीना है ।
औरों के ग़म को पीना है ।
आँखों से अश्क़ चुराना है ।
होठों पे हँसी इक लाना है ।

वरना क्या रक्खा है यारों,
इस दुनियां के सैफीने में ।
जीने का मज़ा तो आता है,
औरों के ख़ातिर जीने में ।

कितना सुकूँ मिल जाता है ,
औरों के आँसू पीने में ,,।
ओ हो हो हो ओ हो हो हो,,,

कुछ लोग तो ऐसे होते हैं ।
औरों के लिए जो रोते हैं ।
अपने दामन की खुशियाँ भी,
ग़म के सहेरा में बोते है ।

थोड़ा सा प्यार लुटाओ तो ,
अपनापन भर कर सीने में ।
जीने का मज़ा तो आता है ,
औरों के खातिर जीने में ।
कितना सुकूँ,,,,,,,,,,,,,,,,,।
ओ हो हो हो हो ओ हो हो ,।

सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ