काव्य भाषा : प्रेम से प्रेम जगे – चरनजीत सिंह कुकरेजा, भोपाल

प्रेम से प्रेम जगे

बहुत ही महीन
और शाश्वत होती है
प्रेम की परिभाषा..।
न कोई रँग,न कोई रूप
और न ही होती है
इसकी कद काठी…।

आकार और विकार से निर्लेप
प्रेम
कब होता है अंकुरित
हमारे/तुम्हारे अन्तस् में
पता ही नही चलता…।

गोद में
स्तनपान करते शिशु पर उमड़ते
माँ के वात्सल्य प्रेम का
मूल्यांकन करना
किसी के लिये संभव है क्या ?

पुष्पित सुमनों की ओर
आकर्षित होते भँवरों का
या फिर
दीपक की लौ में
आत्मदाह करते पतंगों के प्रेम की व्याख्या
क्या सीमित शब्दों में
बयान की जा सकती है ?

स्वाति की आस में
एकटक बादलों को निहारते
चातकों
और नदी किनारे
शिकार की टोह में खड़े बगुलों में भी दिखते हैं
प्रेम के भाव…।
हाँ उनके मायने
अलग अवश्य हो सकते हैं..।

माना,
*प्रेम* में डूब कर
मीरा और हीर के
विषपान करने के उदाहरण
आज के स्वार्थी युग में
पुनः स्थापित होना मुमकिन नही,
पर शबरी,सुदामा,केवट,
राधा और रुक्मणि की तरह अनगिनत
प्रेमियों के
निर्मल निश्छल प्रेम को तो
हम महसूस कर ही सकते हैं…।

सच कहें तो
दाई अक्षर प्रेम के
छोटे से शब्द में
सारा ब्रह्मांड समाहित रहता है…
बस!!
उसे देखने की दृष्टि होनी चाहिये…।

गुजारिश है सबसे
मत कैद करो
स्वछंद उड़ान भरती तितलियों को
प्रेम की निशानी के तौर पर
अपनी डायरियों में…।

इल्तज़ा है सबसे
मत बाँधो प्रेम की उड़ानें
और न ही ठप्पा लगाओ
इसकी मृदुल देह पर
पाश्चात्य सँस्कृति से हासिल हुए
वेलेंटाइन डे का।

प्रेम तो ह्रदय में
कल-कल बहती नदिया है।
इसकी धारा का सँग करो..।
विशुद्ध आत्मा के कोरे सफों पर
प्रेम के रँग भरो…।

मिटा दो अपने दिलों से
भेदभाव,छल कपट और द्वेष के कटु विचार..।
और
करो प्रेम का इतना विस्तार..
कि,
हमको इस सृष्टि पर विचरता
हर प्राणी अपना सा लगे…।
एक दूसरे को देख कर
हममें नफरत या घृणा नही
प्रेम जगे…।

चरनजीत सिंह कुकरेजा,
भोपाल