काव्य भाषा : गुज़ारिश – अमिता राज,बरेली

गुज़ारिश

जीवन बिता देते हैं लोग
महज एक आशियाना बनाने में
लेकिन, तुम हो कि चूकते नहीं बस्तियां उजाड़ने में.

विचारों की इन लम्बी कतारों में
ज्ञान ही अस्त्र है ,
ग्रन्थ ही शस्त्र है, पर
अश्कों से भीगे इन नयनोँ की
महज इतनी सी कहानी है –
जो सूख गया वह मोती है ,
जो बह गया वो नितांत पानी है.
ज्ञान कहता है कि
सांसारिक जीवन से ऊपर उठ जाओ
मनुष्यता कहती है –दुःख में किसी की ढाल बन जाओ
न बना सको किसी को,
तो कम से कम बिगाड़ो न किसी को
इतनी सी गुज़ारिश है मेरी बस सभी से,
फूल बन बिखर जाओ पथ में सभी के,
दिया बन रौशनी बन जाओ सभी के
इतनी सी गुज़ारिश है मेरी बस सभी से.

अमिता राज
बरेली 243122 (उ.प्र.)

5 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर कविता। बधाई अमिता।
    संपादक श्री देवेन्द्र सोनी जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

  2. संपादक महोदय एवम पूजनीय सत्येंद्र भाई का हृदय से आभार

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