काव्य भाषा : ब्रह्म नाद – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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ब्रह्म नाद

सब कुछ नश्वर है…
ये दुनिया ,
दुनिया के रेले
खूबसूरत नजारे
रिश्ते नाते ,
इससे-उससे प्यार…
मिलना-जुलना,
हँसना-हँसाना…
मन्दिर,मस्जिद,गुरुद्वारा…
सुंदर अतिसुंदर सपने
जमाखोर की तरह जमा किये-
मालो-असबाब/
सारे सुख ऐश्वर्य/
परस्पर एतबार…
सब नश्वर हैं…।
सजीव है तो केवल *शब्द*
जो अनवरत चलायमान रहता है…
ब्रम्हांड में..प्रकृति में
निर्जीव-सजीव
जीवों परजीवों में
जाती प्रजाति के हर प्राणी में
हममें/तुममें
गूंजता रहता है *शब्द*
अन्तर की गहराइयों में….।
जो सुन पाता है,
अन्तस् में निरन्तर गूंजते
इस ब्रह्म शब्द के नाद को…!!
पहुँच जाता है
इस मायावी कोलाहल से
एकदम दूर…बहुत दूर
अपनी उदगम स्थली की ओर. …।
कर लेता है फिर अपनी पहचान..
हो जाता है फिर उसे
कभी न रुकने वाले *शब्द* का अन्तस् ज्ञान…।
मिल जाता है उसे फिर
आत्मा को परमात्मा में विलीन करने का…
वह सौभाग्यशाली पल…
इस नश्वर जगत से मुक्त होने के प्रश्नों का
सटीक और सीधा सच्चा हल।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

3 COMMENTS

  1. आपने संसार की नश्वरता और शब्द की अनश्वरता को बहुत ही खूबसूरती से बयां किया है।
    आपने सच ही कहा है कि हम अपने अन्तर्मन के नाद ( आत्मनाद ) को पहचान कर ही हम परमात्मा में विलीन हो सकते हैं ।
    आध्यात्मिक चिंतन से ओतप्रोत इस रचना के लिए आपको पुनः बधाई।
    🌷🌹🌷🌹🙏🙏🙏

    • बहुत ही गहरी बात कही है कैसे कोई उस परम शक्ति में विलीन हो सकता है इस रहस्य को उजागर किया है बधाई

  2. एक ओमकार। उसके कितने रूप और आकार। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। बधाई कुकरेजा सर।

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