काव्य भाषा : बाबूजी – डॉ नीरा प्रसाद धनबाद

बाबूजी

मेरे प्यारे पिताजी, मैं कहती हूं बाबूजी
बच्चों संग खेला करते मेरे न्यारे बाबूजी
अचानक तू न जाने कहां छोड़ चले गए
अब यह जिन्दगी यादों के सहारे हो गए
स्मरण करते ही जिन्हें आंखे भर आई
तेरी सारी बाते धीरे धीरे याद आ गई
तेरी अंगुली पकड़ के चलना सिखी
जीवन के हर मुश्किल से लड़ना सिखी
प्यार दिया इतना हमेशा बेटा ही माना
दिलों मे रख, सबों को अपना ही जाना
तेरी बिटिया बन,मैं इस दुनिया में आई
सबसे ज़्यादा प्यार, मैं तुम से ही पाईं
तेरे नाम से ही पहचान हमारी होती‌ थी
जब तुम साथ होते,शान हमारी होतीथी
परेशान जब मैं होती,तु सपनों में आते
छु कर मेरे शर को, रास्ता दिखला जाते
न जाने कौन सी भूल हुई हम सबों से
खुशी के माहोल में, दूर हो गए सबों से
रोते क्यूं छोड़ गए, तुझे दया न आई
बाबूजी तुझे ‌हम सब कभी भूल न पाई
पिता दिवस पर, तुम्हें प्रणाम करती हूं
हो तु साथ मेरे, एहसास करती रहती हूं।

डॉ नीरा प्रसाद
धनबाद

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