काव्य भाषा : मेरे पापा मेरा अभिमान – भारती यादव ‘मेधा’ रायपुर, छत्तीसगढ़

मेरे पापा हैं मेरा अभिमान

मेरे पापा हैं मेरा अभिमान…
गढ़े जिन्होंने संघर्षों में भी सफलता के नए प्रतिमान…
सिखलाया मुझको ना डरना विपरीत परिस्थितियों से…
डटकर करना सामना हर मुश्किल घड़ियों से…
बिना सहारे अपने दम पे,कर लेना आसमां मुट्ठी में….
सफलता असफलता तो आनी जानी है…
हौसलों की बस रह जानी कहानी है…
यह बात मेरे पापा ने ही सिखलाई है….
अपनों को तो पाला है उनने…
गैरों को भी दिल से अपनाया है…
यह बात अलग है कि हर कोई उन्हें समझ ना पाया है…
पापा का साया है बरगद की शीतल छांव….
दुख और तकलीफे जहां हम बच्चों को छू भी ना पाएं…
बिन कहे ही समझ लेते हैं हमारे मन की बातें…
बचपन से अब तक पूरी की है जानें कितनी आसें…
तकलीफें अपनी भूल हमारी खुशी में मुस्काते हैं…
हर मुश्किल को अपने अनुभव से सुलझाते हैं…
स्नेह के सागर हैं और आशीष के भंडार…
अनुभवो की खान हैं और हौसलों की पहचान…
मेरे पापा हैं मेरा अभिमान.।

भारती यादव ‘मेधा’
रायपुर, छत्तीसगढ़

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