काव्य भाषा : टुट गई हूं पर बिखरी नहीं – दीपिका चौहान, जशपुर छत्तीसगढ़

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टुट गई हूं पर बिखरी नहीं

हां मैं टुट गई हूं परन्तु बिखरी नहीं,
जिंदगी के सफ़र में लुढ़क गई हूं परन्तु गिरी नहीं।
हां इस समय की पाबंदी ने कर दिया है मुझे उथल-पुथल,
परन्तु निश्चय की आग अभी बूझी नहीं।
हां मैं टुट गई हूं परन्तु बिखरी नहीं।।
“उस कम्बख़त बात ने क्या जादू किया”²
हो गया हाल मेरा बेहाल,
सोई थी परन्तु नींद मुझे आई नहीं,
पर फिर भी उस बात के घेरे में सिमटी नहीं ।
हां मैं टुट गई हूं परन्तु बिखरी नहीं,
जिंदगी के सफ़र में लुढ़क गई हूं परन्तु गिरी नहीं।।

दीपिका चौहान,
जशपुर छत्तीसगढ़।।

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