काव्य भाषा : सपने – डॉ शरद सिंह , सागर

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सपने
– डॉ शरद सिंह

कुछ आम से सपने
कुछ नीम से सपने
कुछ पंछी के अधखाए
अमरूद से सपने
कुछ गिलहरी के कुतरे सपने
कुछ ज़मीन पर उतरे सपने
कुछ पूनम से सपने
कुछ ग्रहण से सपने
कुछ सुलाए रखने वाले सपने
कुछ डरा कर जगा देने वाले सपने
मगर सपनों के लिए शर्त है
कि नींद आए
नहीं आते सपने रतजगे में
जैसे अमावस में नहीं आता चांद
जैसे काले बादल से नहीं गिरती धूप
जैसे पहले-सा नहीं जुड़ता टूटा हुआ कांच
जो देखना चाहे सपने
उसे करना होगा
नींद का जुगाड़

सपने देखना बुरा नहीं
बुरा है टूट जाना सपनों का
जागने से पहले ही।

सागर, मध्यप्रदेश

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