विविध : पिता की भूमिका – नीलम द्विवेदी रायपुर, छत्तीसगढ़

पिता की भूमिका

एक पुरूष के जीवन का सबसे सुंदर पल, वो जब छूता हैं नाजुक सी उंगलियां, नन्हे से पैरों को। बच्चे के कोमल से तन को, कहीं खरोंच न लग जाये उसके छूने से,ये सोचकर देखता है अपने खुरदुरे कठोर हाथों को, फिर डरते हुए उठाता है उस नन्हीं सी जान को बाहों में अपनी, और जब उस नन्हे से दिल की धड़कन सुनता है अपने कानों से, पिघलने लगती है उसके अंदर की सारी कठोरता, पुरुष का हृदय जाने किन संवेदनाओं से भर जाता है। आ जाता है एक ठहराव, एक बदलाव उसके स्वभाव में। बन जाता है एक घनी छाँव, एक ढाल , एक सम्बल, एक भरोसा उस नए मेहमान के लिए। पुरूष के चंचल स्वभाव में आ जाती है एक स्थिरता। उस नन्ही सी जान की जीवन पर्यंत सुरक्षा और उसकी प्यारी सी एक मुस्कुराहट के लिए अपना सारा जीवन अर्पण करने की सौगंध मन में लेता है। स्त्री की तरह पुरूष भी एक नया जन्म लेता है, जब वो पिता बन जाता है। माँ अपनी ममता लोरी गाकर व्यक्त करती है और पिता कड़ी धूप में पसीना बहाकर। पिता अधिक से अधिक परिश्रम करके, खुद को फौलाद सा मजबूत बनाकर ,हर तरह से संघर्ष करके अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए हर सुख साधनों की व्यवस्था करके अपना प्रेम प्रदर्शित करता है। पिता का प्रेम एक पुरूष भी सही तरह से तभी समझ पाता है जब वह स्वयं पिता बनता है। जीवन में पिता की भूमिका एक छायादार वृक्ष की तरह है।पिता अपनी संतान का सबसे अच्छा मित्र और मार्गदर्शक होता है। पिता कभी कठोर बनके गलती करने पर सजा देते हैं तो कभी लाड़ प्यार करके आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।पिता संतान के अंदर साहस पैदा करते हैं और हर परिस्थिति में उसके साथ होने का विश्वास भरते हैं।
संसार के समस्त पिताओं को, उनके निःस्वार्थ प्रेम को मेरा नमन।

” पिता संम्बल,पिता रक्षक, पिता अधिकार है मेरा,
जो मेरे जीवन की ज्योति दे, पिता भगवान है मेरा।”

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here