काव्य भाषा : प्रकृति के उपहार – श्वेता शर्मा रायपुर

प्रकृति के उपहार

प्रकृति के उपहार निराले
लगते कितने प्यारे प्यारे
प्रकृति ने ही हमको पाल
प्रकृति के हम रखवाले

गिरी शृंखला फैली चहु ओर
नदियाँ कल कल करे शोर
हरे भरे कानन को न छोड़
आओ चले प्रकृति की ओर

देखो चाहे विश्व का छोर
फैली सुंदरता हर एक कोर
कश्मीर से कन्याकुमारी की ओर
हर तरफ प्रकृति का ही शोर

प्रकृति का गुणगान करो
आओ मिलकर इसे प्यार करो
बढ़ाओ कदम बिना कोई शोर
आओ चले प्रकृति की ओर

श्वेता शर्मा
रायपुर छत्तीसगढ़

स्वरचित