काव्य भाषा : नया सवेरा – डॉ0 अखिलेश्वर तिवारी पटना

नया सवेरा

तारीक का शिकार पुरा कुनबा हो गया है।
नया नया बना है प्याज का आदी हो गया है।
बहुत जल्दी भूल गए सब लोग बर्बरता को।
हमारा हीं जीन है हमारा दुश्मन हो गया है।

अंधेरों में रहकर अंधेरों की आदत हो गई है।
उजाले में आँखें चोंधियाने लग गई हैं।
देख नहीं पाता है उजाले की तासीर को।
डार्विन के सिद्धांतों को मानने लग गया है।

जी हाँ चार पुश्त पहले हमारा ही भाई था वो।
बल प्रयोग के चलते राह बदल लिया था वो।
मिलकर साथ रहने की कोशिश करनी है हमें।
उम्मीद है फिर से रास्ता पर आ जाएगा वो।

एक बार सभी मिलकर इतिहास लिख देंगे।
खोई हुई संस्कृति को फिर जिंदा कर देंगे।
एकता में बड़ी ताकत होती है मेरे भाइयों।
सनातनी होकर भारत को विश्व गुरु बना देंगे।

डॉ0 अखिलेश्वर तिवारी
पटना

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