काव्य भाषा : बलिदान दिवस पर विशेष- जय लक्ष्मीबाई -डॉ.अनिल शर्मा ‘अनिल’ धामपुर,उत्तर प्रदेश

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बलिदान दिवस पर विशेष-
जय लक्ष्मीबाई

झांसी की रानी थी वह
न डरी कभी न घबराई।
जन जन के मन में बसी हुई
है अमर सदा लक्ष्मीबाई।।
अट्ठारह सौ सत्तावन का,
स्वातंत्र्य समर उद्घघोष हुआ।
अंग्रेजी सत्ता थर्रायी,
राजाओं के प्रति रोष हुआ।।
चाहते थे वो झांसी कब्जाना,
कोशिश उनकी नाकाम रही।
लक्ष्मीबाई दृढ़संकल्पित
झांसी के हित अविराम रही।।
मैं न दूंगीं,अपनी झांसी
उसने खुलकर घोषणा करी।
धमकाया अंग्रेजों ने बहुत
लेकिन रानी न तनिक डरी।।
अट्ठारह सौ अट्ठावन का
वह जून महीना था भारी।
अंग्रेजी फौज से, रानी का
भीषण युद्ध रहा जारी।।
कोटा की सराय के निकट
रानी को उन्होंने घेर लिया।
कुछ सैनिक झांसी के मारे,
कुछ को झांसी ने ढेर किया।
इस बीच हुई घायल रानी,
वीरता से वह लड़ती ही रही।
बहता था लहू जख्मों से,
फिर भी वह आगे बढ़ती रही।
फिर वार हुआ उनके सिर पर,
घोड़े से लुढ़क गयी रानी।
सैनिक मंदिर में उठा लाए,
पिलवाया उनको कुछ पानी।।
सतरह-अठारह जून रही,
जब हुई घायल लक्ष्मीबाई।
उसका पीछा करते करते
अंग्रेजी सेना मंदिर आई।।
अंग्रेज न छू पाएं मुझको,
रानी ने कहा पुजारी से।
इतना कह प्राण छोड़ दिए,
नम नयन सभी मन भारी से।।
लकड़ियां इकट्ठा करीं तुरंत,
रानी का दाह संस्कार किया।
अंग्रेजी सेना आ धमकी,
जो मिला उस पर प्रहार किया।।
शव पड़े हुए थे मंदिर में,
बस एक चिता जलती पाई।
बलिदान हुई न झुकी कभी
जय जय जय हे लक्ष्मीबाई।।
बलिदान दिवस पर नमन तुम्हें
हो अमर सदा तुम बलिदानी।
रहती सृष्टि तक गायेंगे सब,
वीरता तेरी झांसी रानी।

डॉ.अनिल शर्मा ‘अनिल’
धामपुर,उत्तर प्रदेश

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