काव्य भाषा : दर्द जो रुकता नहीं,वक्त जो कटता नहीं -संध्या नन्दी दिल्ली

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दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

दर्द जो रूकता नहीं
वक्त जो कटता नहीं
बंजर हो चली है उम्मीद की धरती
कोई आशा अब उगती नहीं

सुनसान दिन, भयावह रातें
चारो पहर लगी रहती एक आंशका
कि आगे क्या
दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

खौफ है पसरा – पसरा
हर इंसान है डरा – डरा
ना जाने कौन सा पल
लेकर आ जाए मौत का समां
दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

होती जाती सड़के सुनी
सर्वत्र छाता जाता विराना
ये कौन सी आँधी चल रही है
हंसता – खेलता चमन होता जाता उजड़ा – उजड़ा
दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

तरस जाती थी जो अंखियाँ दीदार को
धड़कन रूकने को होती है मिलन को
ना सहारा अपनों का , ना अपनों से रखना उम्मीद
एक छलना – छलावे में हो रहा है जीवन व्यतीत
दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

कौन सी गति पाई है किसने
ना किसी को पता पर
अंजाने मौत के भय ने कर दिया सबको जुदा
अब तो खुद की परछाई से भी लगता है भय
ना जाने कौन सा साया है कफन में लिपटा
दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

जाना कँहा है ? जायेंगे कँहा ?
जब इस लोक का नहीं पता तो
परलोक का क्या ?
टूट रहा विश्वास है , नाश हो रहा पराकाष्ठा है
धर्म और धार्मिक मनोदशा में उठ रहा सवाल है
दर्द जो रूकता नहीं , वक्त जो कटता नहीं

संध्या नन्दी
दिल्ली

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