काव्य भाषा : रे प्राणी – शशि बाला हजारीबाग

रे प्राणी

विधाता की लिखी इबारत है
जिंदगी
स्लेट पर पेंसिल से लिखी कहानी नहीं
कि मिटा मिटा कर फिर से
लिख दिया जाए
न ही रेत पर खिंची लकीर ही है
कि पानी से भी मिट जाए

विधाता ने लिखा
और यूं ही नहीं लिखा
हमारे क ई क ई जन्मों के कर्म का
फलाफल देखकर लिखा
संभावनाएं भी अनंत दिया उसने
कि बिगड़ी संवार लें
छूट भी दिया कि अपनी सोच के अनुसार
जिन्दगी को ढाल लें

बार बार क्षमा भी करता है वह
अबोध जानकर

अब इतने पर भी
हल्के में लेना जीवन जैसे
गूढ़ तत्व को
मूर्खता नहीं तो और क्या है !
रे प्राणी!
तू तो खिलौना है उसके हाथ का
तो नाचने से इनकार कैसा?
मन में उसको भज
और पांवों को करने दे नर्तन

कि और कोई विकल्प है ही नहीं!!

शशि बाला
हजारीबाग

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