कहानी : पछतावा – डॉ.शिखा नागर गाजियाबाद (उ.प्र)

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कहानी

पछतावा

आज उदयभान जी को रह-रह कर अपने स्वर्गीय पिताजी की कही वो बातें बार-बार याद आ रही है- “बेटा, पैसा तो हाथ का मैल है, आता जाता रहेगा। तुम समय से मोती चुराकर सुनहरी यादें बना लो‌। पता नहीं फिर यह समय कल मौका दे ना दे”। सोचते सोचते उदयभान जी अपनी यादों के समंदर में बह निकले….

“जानवी !! मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है। तुमने अभी तक टिफिन तैयार नहीं किया ? अच्छा छोड़ो, मैं चलता हूॅं। बाहर से कुछ मंगवा लूंगा।” कहते हुए तेज कदमों से उदयभान ऑफिस निकल जाते हैं।
जानवी सुनिए…. सुनिए… कहती, एक हाथ में टिफिन लिए आवाज देती रह जाती है।

बस यही तो करता रहा में उम्र भर। परिवार को बेहतर सुख सुविधाएं देने, अच्छा रहन-सहन उपलब्ध करवाने की दौड़ में, मैं उनके साथ समय गुजारना तो भूल ही गया। मुझे तो पता भी नहीं चला, मानव कब स्कूल से कॉलेज तक पहुंच गया। कब उसने नौकरी करना भी शुरू कर दिया।
जानवी अपनी सूझबूझ, समझदारी से सब कुछ कितना अच्छे से संभाल लेती थी। मुझे तो याद भी नहीं जानवी ने कभी कोई शिकायत भी की हो। कभी कोई परेशानी मुझ तक आने दी हो‌। बस मेरी दिनचर्या, मेरी जरूरत के हिसाब से वो अपने आपको ढालती चली गई। और मैं पैसे कमाने की अंधी दौड़ में भागता ही चला गया। कभी जान ही नहीं पाया जानवी की बीमारी के बारे में, घर परिवार के बारे में, बेटे मानव के बारे में, तीज़-त्योहार के बारे में। जानवी सारे दुख दर्द अकेले ही सहती रही।
काश !!
मैंने पैसे कमाने के साथ-साथ अपने परिवार को थोड़ा समय भी दिया होता। हां माना… मैंने, अपनी सभी जिम्मेदारियां बखूबी निभाई… मानव आज अपने पैरों पर खड़ा हो विदेश में अच्छी नौकरी कर रहा है। बेटा-बहू दोनों बहुत खुश हैं। खुशी-खुशी अपना जीवन यापन कर रहे हैं। मुझे भी समय पर पैसे भेजते हैं। फोन पर ही सही मेरा ध्यान तो रखते हैं।
लेकिन जानवी….. जानवी, तुम तो मेरी जीवनसंगिनी थी… मेरी जीवनसाथी, मेरी हम-कदम….हमराज, मेरी परछाई। इस वक्त जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी। उस वक्त तुम मुझे अकेला छोड़कर क्यों चली गई? सोचा था मैंने…जीवन के बचे शेष सभी पल मैं सिर्फ तुम्हारे लिए, तुम्हारे साथ जिऊंगा। जो पल मैंने अपने काम को पूरा करने की आड़ में खो दिए हैं, उन सभी पलो को तुम्हारे और मानव के साथ फिर से जीऊंगा। उनकी यादों को अपने मन की तिजोरी में संभाल कर रख लूंगा।
सोचा था जानवी के साथ लंबी विदेश यात्रा पर जाऊंगा। हम दोनों के मन में जो इच्छाएं दबी रह गई हैं, उन सभी इच्छाओं को एक-एक करके पूरी करूंगा। जानवी को वो तमाम पल, वो अनकही खुशियां लौटाऊंगा जो उसने मेरे इंतजार में खोई हैं।

लेकिन…. लेकिन, ऐसा कुछ भी ना हो सका। समय ने मुझेसे सब छीन लिया।अब तो मुझे लगता है ईश्वर ने मेरे साथ बिल्कुल सही इंसाफ किया है। परिवार की सुख-सुविधाओं के लिए मैं बस पैसे सौंपता था अपना समय नहीं। आज उसी पैसे ने मेरे बेटे की जगह ले ली है। पैसा ही मेरे बुढ़ापे की लाठी बन गया है। मेरा बेटा मानव तो मुझे भूल अपनी ही दुनिया में खुश है।
और मैं…. मैं तन्हा, लाचार…..
काश !! मैंने तुम्हें और मानव को अपना समय दिया होता तो आज ऐसे विरान, परेशान हो अकेला बैठा मैं यह सब ना सोच रहा होता।

डॉ.शिखा नागर
गाजियाबाद (उ.प्र)

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