लघुकथा : एक अनाथ – कुन्ना चौधरी जयपुर

एक अनाथ

बड़े से जगमगाते शहर में बहुमंज़िला इमारत,और उसमें शान से रहती मिसेज़ मेहरा , पैसा गाड़ी सभी सुख सुविधा से गुजरती ज़िन्दगी। दो साल में पर सब बदल गया मिस्टर मेहरा चल बसे ,पैसे की कोई तंगी नहीं थी पर ,साथ बोलने वाला कोई नहीं था ,जैसे तैसे नौकरों के सहारे दो बरस बिताये और आज वो भी चली गई …..
अंत्येष्टि और सबको खबर करना ,सामग्री पंडित क्रिया का इंतज़ाम सब गोपाल कर रहा था।
लोग बातें कर रहे थे .’इनका बेटा तो अमेरीका रहता है ना बहू पोते भी ….कभी देखा नही ‘
एक पड़ोसन ने कहा ‘हाँ जी ,वो तो बस पिता के मरने पर आया था ,फिर कभी नहीं आया ‘
किसी ने पूछ ही लिया ‘फिर ये गोपाल कौन है,जो सब कुछ कर रहा है ?!
जो बताया पड़ोसन ने सुन कर मन में कई विचार घूमने लगे …
गोपाल मिसेज़ मेहरा के घर पर काम करने वाली बाई का बेटा था,जो दस बरस की उम्र में अनाथ हो गया था ,मिसेज़ मेहरा ने अपने बेटे कृष्णा के साथ खेलने के लिये उसे रख लिया ।
दिन गुजरते गये कृष्ण पढ़ाई करता ,गोपाल उसके कपड़े खिलौने कमरे का ध्यान रखता ।देखते देखते कृष्णा कालेज गया ,फिर विदेश में काम और फिर वहीं शादी ……कृष्णा माता पिता से दूर होता चला गया ।गोपाल मिसेज़ मेहरा का दायां हाथ बन गया …मेहरा साहब के जाने के बाद तो बेटे से बढ़ कर सेवा की गोपाल ने ,डाक्टर के ले जाना खाना बाज़ार सभी कुछ तो गोपाल ही कर रहा था ।
लगा मानो आज गोपाल फिर अनाथ हो गया ,क्यों कि कृष्णा ने तो पहले ही धन सम्पत्ति अपने नाम करवा ली थी ……और जो अपने माता-पिता का नहीं हुआ उसे गोपाल से कैसा लेना देना ॥
ये बातें सुन कर लगा बड़े बड़े शहर में इमारतें ही चमकती है मन में तो अभी भी अंधेरा ही है ।

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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