काव्य भाषा : कहो न दोस्त – शशि बाला हजारीबाग

कहो न दोस्त

ठंढी हवा और
सागर तट की मखमली रेती
लहरों का मधुर स्वर और दूर तक
पानी ही पानी
कभी कभी हल्के छींटे आ जाते
झपकी आने लगी थी

मैंने देखा रेत पर जहां तहां
छोटे छोटे शंख और
सीपियां ढेर सारी
मुझे याद आई किसी की कही बात
कि अंजुरी भर शंख सीपियां चुनकर
आँखें मूंदकर
किसी को याद करते हुए
समुंदर में उछाल दो
ठीक वैसे ही जैसे विदाई के वक्त
पीले चावल उछालती है कन्या
तो ,वह, जिसे याद किया
नजरों के सामने होगा

बात पूरी याद थी
पर विश्वास पूरा नहीं था
सोचा ,देख लेते हैं,समुंदर भी तो
सामने ही है
यहां वहां से चुनकर जमा कर लिया
ढेर सी सीपियां
पल भर बाद ही सब कुलबुलाने लगीं
हथेलियों में गुदगुदी सी हुई
झट से आँखें मूंद लिया मैंने
घूमकर खड़ी हो गयी
उन्हें पानी में उछाल दिया
और तुम्हें याद किया

घोर आश्चर्य!
तुम बिल्कुल सामने थे।
कुछ पल यूं ही देखती रही तुम्हें
न बोल फूटे,न कदम बढ़े
कुछ भी पूछ नहीं पाई

जरा स्थिर होते ही ढूंढा
तुम कहीं नहीं दिखे

मैंने फिर से शंख सीपियां चुनना
शुरु कर दिया
फिर से वही सब..
और तुम फिर सामने थे
ठीक इतनी ही दूरी पर
कि हाथ बढ़ाऊं तो छू लूं

धड़कनें गड़बड़ा गयीं
असंयत हो गयी सांसें भी
सिहरन हो आई
सच मानूं या न मानूं,ऊहापोह में पड़ी हूं
कुछ बोलूं या न बोलूं
पुकारुं या जाने दूं

अब कोई जगा रहा है
लेकिन मैं आँख खोलना नहीं चाहती
ऐसा सुंदर सपना टूट जाए
कदापि नहीं चाहती
मैं ही क्यों
कोई नहीं चाहेगा
तुम चाहोगे क्या ???
कहो न दोस्त !!

शशि बाला
हजारीबाग

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