काव्य भाषा : विदाई – शेफालिका, रांची

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विदाई

समय को चलते देखा है
मौसम बदलते देखा है।
दहलीज़ से कदम निकाल
शिखर पर चढ़ते देखा है।
बराबर समझते न थे
पर आज साथ बढ़ते देखा है।
लक्ष्मण रेखा से आगे
सपनों को पूरा करते देखा है।
समय को चलते देखा है
मिज़ाज बदलते देखा है।

साथ चलकर समय के
सफ़र तय किया है
मंजिल मिली है
शोहरत मिली है
हर भूमिका में है योग्यता दिखाई
पर पूरी जमात को समझ में ना आई
आज भी लोग करते हैं
‘कोख’ में ही विदाई।

शेफालिका
रांची

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