लघुकथा : कोरेन्टाइन – कुन्ना चौधरी जयपुर

कोरेन्टाइन

जैन परिवार का इकलौता लाड़ला ,जतिन फ़ोन विडियो गेम और हर चीज़ हाज़िर ,ऐशो-आराम में कट रही थी ज़िन्दगी ।मजाल है घर के किसी काम में मदद कर दे ,अगर कह भी दो किसी काम के लिये ,तो तपाक से जवाब आता मैं नौकर हूँ क्या ? और दादी भी पक्ष ले लेती बच्चा है ना ,मत परेशान करो ।फिर ये करोना आया और दादी बाबा अस्पताल चले गये ,दो दिन बाद मम्मी पापा को भी बुख़ार आया और वो भी कोरेन्टाइन कर दिये गये ।
जतिन को फ़ोन पर तरह तरह के निर्देश मिलरहे थे ,पापा कह रहे ,दवाई सब्ज़ी आर्डर की है सम्भालो ।बाई जी से सफ़ाई खाना बर्तन कपड़े सब करवाकर घर सेनिटाईज करो मम्मी ने कहा ,दो दिन तो कुछ समझ ही नहीं आया फिर धीरे धीरे जतिन सब करने लगा ।
अब उसके पास गेम खेलने का दोस्तों से बात करने का समय ही नहीं था ।
मम्मी पापा को कमरे में खाना देना ,उनके बर्तन उठाना ,पानी की मोटर चलाना और बीसियों काम ।पर बिना किसी शिकायत के उसने सब किया ।
जतिन आज फ़ोन पर कह रहा था …’यार मुझे तो पता ही नहीं था , मम्मी पापा इतना कुछ करते है ….अब मैं कम खेलूँगा और कुछ उनका हाथ बंटा दूँगा…..’
१४ दिन बाद मम्मी पापा ने जतिन में जो बदलाव देखा तो सोचने लगे …
हम चौदह साल में जो न सीखा पाये १४ दिन के कोरेटाइन ने सीखा दिया ।हम जिसे आलसी और बिगड़ा बच्चा समझ रहे थे ,मुसीबत में देखो वहीं काम आया।सच ज़िम्मेदारी सर पर आती है तो अच्छे अच्छे सीख जाते है ।

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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