काव्य भाषा : बेटी आ रही है – मनीष सिन्हा बैंगलोर

बेटी आ रही है

वर्षों पुरानी बात है
दोपहर का वक्त था
सहकर्मियों के साथ
घर लौटा तो
दहलीज़ पर ही एक ने
बहस में ललकारा।
मैं उसी में उलझ गया।

एक तीन साल की बच्ची को
मेरे विलंब का आभास हुआ।
खिड़की की जाली पर जा चढ़ी
और ऐसा कोहराम मचाया
कि सब दोस्त रफूचक्कर हो गये,
यह कहकर कि “जल्दी जाओ
वरना बेटी नाराज़ हो जाएगी।”

घर पहुंचा, 
तो विलंब को अनदेखा कर,
किलकारियां मारती हुई,
छोटी मुझसे लिपट गयी।
अपनी ऊल-जलूल की बातें करती,
घंटों तक खेलती रही।
जब थक गई,
तब बड़े आराम से
चादर तानकर सो गई।

घंटे साल में बदल गये
शाम हो चली।
  जीवन ने
संग्राम के लिए ललकारा 
तो योद्धा का रूप 
धारण कर,
निकल पड़ी छोटी,
दूर दराज 
के देशों की ओर
और अपनी लड़ाइयों
में उलझ गई।

फिर बरसों बाद,
आज जब मुझे
 रात का आदेश आया,
कि अंधकार का चादर
ओढ़ने का वक्त आ गया है,
तब बेटी ने लौटने का
संदेशा भिजवाया।

मैं तो खिड़की पर
 नहीं चढ़ पाऊंगा।
लेकिन विलंब का
आभास हो रहा है।
 मेरा मन बार बार 
खिड़की पर चढ़ जाता है।
उसे देख नहीं पाता, 
तो ऊल-जलूल बड़बड़ाता है।

जब आयेगी, 
तब विलंब को अनदेखा कर
 किलकारियां मारता,
उससे लिपट जाउँगा।
उसके बाद आने दो रात को।
मैं आराम से चादर तानकर
सो जाऊँगा।

मनीष सिन्हा
बैंगलोर

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