काव्य भाषा : लहरें – शेफालिका रांची

लहरें

लहरें आती हैं, जाती हैं
लहरों से क्या घबड़ाना
ये सच है, लहरें कभी दुलारती
तो कभी त्रासदी मचाती हैं।

लहरों के थपेड़े खाते हम पत्थर तो नहीं
पर हमें पत्थर दिल बनना होगा।
दुःख को, तकलीफ को,वियोग को
सहकर आगे बढ़ना होगा।

इतिहास गवाह है
जब भी लहरों ने तबाही मचाई है
किसी को नहीं छोड़ा।
जन -जीवन, घर-मकान
और जानवर-खलिहान
सब पर छोड़ा अपना निशान
हर बार इनसे उबर कर
आगे आया है इंसान
आगे आया है इंसान।।

शेफालिका
रांची

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