लघुकथा : अपने पराये – महेश राजा,महासमुंद

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अपने पराये

त्रिभुवन दास जी झूले पर बैठकर आज का अखबार पढ़ रहे थे।तभी बहु वन्या चाय लेकर आयी।

वन्या ने उन के चरण स्पर्श किये।उन्होंने ढ़ेर सारा आशीर्वाद दिया।

तभी वन्या का मोबाईल बजा।फोन पर काफी देर बातें होती रही।वन्या रो रही थी।फोन की समाप्ति पर त्रिभुवन दास जी ने पूछा-“किसका फोन था बेटी?और तुम रो क्यों रही हो?सब ठीक तो है न ?”

वन्या ने बताया उसकी माताजी का फोन था।वे परेशान थी। भाभी उन्हें ठीक से भोजन भी नहीं देती ।उनका ख्याल भी नहीं रखती हैं।भाई भी अब ज्यादा परवाह नहीं करता है।

त्रिभुवन दासजी ने कहा-“अपने को संभालो।ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा।”

उन्होंने तुरंत बेटे को बुलाया। समधनजी को लाने के लिये कार लेकर बहु के मायके भेजा।

शाम को बेटा अपनी सासजी के साथ लौट आया।

दरवाजे पर स्वागत करते हुए त्रिभुवन दासजी बोले-“आईये समधन जी।इसे अपना ही घर समझें।बेटा वन्या. जाओ माताजी को उनका कमरा दिखाओ।आज से ये यहीं रहेगी,हमारी बहन बनकर।”

वन्या की आँखों से खुशी के आँसू टपक पड़े।उसने पापाजी के पांँव

छुये।समधनजी की आँखों से भी अविरल आँसुओं की धार बह चली।

भीतर से नन्हीं वसुधा दौड़कर आयी,नानी…नानी..कह कर उनसे लिपट पड़ी।

महेश राजा
वसंत 51/कालेज रोड़
महासमुंद।छत्तीसगढ़।
9425201544

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