काव्य भाषा : परवरिश बेचने में कहाँ झिझकता है कोई -डॉ.अखिलेश्वर तिवारी पटना

परवरिश बेचने में कहाँ झिझकता है कोई

मुल्क कि बेबसी को यहाँ समझता नहीं है कोई।
उसके दिल की गहराइयों को छूता नहीं है कोई।

सभी अपना अपना जमीर बेंचकर बैठे हैं यहाँ।
अपने वाल्दैन को वाल्दैन मानता कहाँ है कोई।

माँ की गोदियों में चैन की नींद सोता है सब कोई।
पर उसी को बेचने में परहेज नहीं करता है कोई।

पैसे की हबस इस कदर बढ़ गई है ऐसे लोगों की।
रिस्ते नाते पैसों के बीच में लाता नहीं है कोई।

निर्लज तो ऐसे हैं सभी कि एल्मा मैटर को भूल गए।
अपने परवरिश को बेचने में कहाँ झिझकता है कोई।

इनमें से ज्यादातर जाहिल पढ़े लिखे फाजिल हीं हैं।
दहसतगर्दी के समर्थन करने से चुकता नहीं है कोई।

समन्दर होने का दावा बेशक उन सबका होता है।
पर कतरा होने का जिगर नहीं रखता है कोई।

उसमें कुछ दरिया का हुनर रखने की बात करताहै।
पर नाली के कीड़े से अलग दिखता नहीं है कोई।

गिरोह है इनका जिसमे बिभिन्न तरह के जानवर है।
कुत्ते भेड़िये नरपिचास गिद्ध से हटकर नहीं है कोई।

आजकल कुकुरमुत्ते छा गये ज्यादातर विभागों में।
जोड़ तोड़ से ऊपर की औक़ात रखता नहीं है कोई।

लायक नहीं है सियासी जोड़ तोड़ से अवार्ड पा लिए।
अवार्ड लौटाकर सियासी दाव से शर्माता नहीं है कोई।

डॉ.अखिलेश्वर तिवारी
पटना

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