काव्य भाषा : हिसाब करो – रजनीश “स्वछन्द” दिल्ली

हिसाब करो

वादों का ज़रा हिसाब करो,
नारों का ज़रा हिसाब करो।
गर बात चली तेरी सुन ले,
बातों का ज़रा हिसाब करो।

सूरज देखा लपके हम थे,
हाँ आँख तभी झपके हम थे।
ये भूख भरी क्यूँ रात रही,
रातों का ज़रा हिसाब करो।।

नर नर में अलख जगाया था,
क्या ऐसा सबक सिखाया था।
क्यूँ हाथ बढ़े इज़्ज़त लूटी,
हाथों का ज़रा हिसाब करो।

कोई मर हार पहनता है,
कोई मंचों पे सजता है।
जो हार गले ये शोभित है,
हारों का ज़रा हिसाब करो।

कितने मशाल हैं आज जले,
कितने मलाल तन आज पले।
क्यूँ तिमिर खड़े, जो सूरज थे,
तारों का ज़रा हिसाब करो।

अपने बन देखो घूम रहे,
गीता कुरान बस चूम रहे।
क्यूँ पीठ चुभे हैं बन खंज़र,
वारों का ज़रा हिसाब करो।

तख़्ती बैनर जो ज़िंदा हैं,
सच जान सुनो शर्मिंदा हैं।
क्यूँ आज माथ धड़ से छिटके,
माथों का ज़रा हिसाब करो।

हक़ भी अख़बारी आज दिखा,
नत सिर दरबारी आज दिखा।
जो नाथ बना पत्थर बैठा,
नाथों का ज़रा हिसाब करो।

सच, कहीं बिलखते बच्चे थे,
पन्नों में मन के सच्चे थे।
फुटपाथ पड़े क्यूँ दिन गिनते,
साँसों का ज़रा हिसाब करो।

हमने देखा, सबने देखा,
है अमिट, नहीं मिटती रेखा।
जो मूक बधिर हैं ताक रहे,
आँखों का ज़रा हिसाब करो।

©रजनीश “स्वछन्द”
दिल्ली

2 COMMENTS

  1. बहुत सारी चीजें सच मे हिसाब माँगती हैं,जिनमे से बहुत कुछ यहां आ गईं
    बहुत बढ़िया🙏👌

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