काव्य भाषा : भगवान से कुछ गूढ़ सवाल -मनीष सिन्हा  बैंगलोर

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भगवान से कुछ गूढ़ सवाल

तेरे चरणों 
नतमस्तक रहूँ, 
पत्थर में लिखा 
यह फर्ज़ क्यों है?
कभी हँसी-मजाक 
कुछ सवाल करूँ, 
तो बता इसमें,
फिर हर्ज़ क्यों है?

जग भर फैले,
तेरे ताप की ज्वाला 
तो जाड़ों में इतना, 
सर्द क्यों है?
तू ही मेरे 
रग-रग में दौड़े
तो बता जोड़ों में, 
दर्द क्यों है?

सेवा करूँ, 
तेरा नाम न लूँ 
नगण्य ऐसा
हर कर्म क्यों है?
तेरे नाम का ही
जो व्यापार करूँ,
श्रद्धालु नज़रों में 
यह धर्म क्यों है?

हर धर्म में पत्नी ही,
ज्ञान का सागर।
हर ग्रंथ का अलग, 
फिर तर्क क्यों है?
हर धर्म, गंजों की 
तादाद बराबर।
मस्तिष्क के सोच में, 
फिर फर्क क्यों है?

बस तेरी ही सूरत 
सब ओर दिखे,
यह शर्त रखवाता, 
हर धर्म क्यों है?
जिन बंद नज़रों में
बस प्रेमिका,
उन पाक पलकों में
शर्म क्यों है?

सुख, धन, मोक्ष, 
सब छलकाती, 
तो पृथ्वी, इस लोक का, 
वर्ग क्योँ है?
मुस्कराता मैं ,
इसी धरती पर,
तो अलग ब्रम्हाण्ड
पर स्वर्ग क्यों है?

मनीष सिन्हा 
बैंगलोर

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